दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के लिए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) कार्य में लगे कर्मचारियों की जिम्मेदारियों को लेकर एक महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि राज्य सरकारों द्वारा प्रतिनियुक्ति पर भेजे गए सरकारी कर्मचारियों की यह वैधानिक और संवैधानिक बाध्यता है कि वे आयोग द्वारा सौंपे गए कार्यों को पूरी निष्ठा के साथ पूरा करें। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, यह कोई विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्य कर्तव्य है। यदि किसी कर्मचारी को कार्य के दौरान असुविधा या अतिरिक्त भार का सामना करना पड़ रहा है, तो इसका समाधान राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त स्टाफ नियुक्त करके किया जा सकता है, लेकिन ड्यूटी से बचने का अधिकार कर्मचारियों को नहीं दिया जा सकता।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने यह फैसला उन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिया, जिनमें विभिन्न राज्यों के BLO (बूथ लेवल ऑफिसर) चुनाव आयोग द्वारा लगाए गए भारी कार्यभार और दंडात्मक कार्रवाई को चुनौती दे रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया कि कई राज्यों में BLO को अपनी नियमित नौकरी—जैसे स्कूलों में पढ़ाना, आंगनबाड़ी का काम—पूरा करने के बाद देर रात तक SIR का अतिरिक्त काम करना पड़ रहा है। इससे उन पर दोहरा बोझ पड़ता है, जिससे मानसिक और शारीरिक तनाव बढ़ रहा है। हालांकि, बेंच ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि कठिनाइयों के बावजूद ड्यूटी करना कानूनन अनिवार्य है, और यदि काम का भार अधिक है तो राज्य सरकारें अतिरिक्त कर्मचारियों की तैनाती करके कार्य का बोझ बांट सकती हैं।
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सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को निर्देश दिया कि जहां SIR कार्य चल रहे हैं, वहां यदि कर्मचारियों पर अत्यधिक दबाव की स्थिति उत्पन्न हो रही है तो चुनाव आयोग को अतिरिक्त समर्थन उपलब्ध कराया जाए। साथ ही, अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी कर्मचारी के पास वैध और विशिष्ट कारण है कि वह चुनावी ड्यूटी नहीं कर सकता, तो राज्य सरकार के सक्षम अधिकारी उसके मामले को व्यक्तिगत रूप से सुनकर उपयुक्त निर्णय ले सकते हैं। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि कर्मचारी को बिना वैकल्पिक व्यवस्था किए कार्य से मुक्त कर दिया जाए। राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि चुनाव आयोग को आवश्यक मानव संसाधन उपलब्ध कराते रहें, चाहे संख्या बढ़ानी पड़े।
सुप्रीम कोर्ट ने BLO द्वारा SIR ड्यूटी के दौरान मौत के मामलों पर भी संवेदनशील रुख अपनाया। अदालत ने कहा कि पीड़ित परिवार या याचिकाकर्ता अनुग्रह राशि (एक्स-ग्रेशिया) और अन्य मांगों के लिए अलग से आवेदन कर सकते हैं। यह टिप्पणी तमिल अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेत्रि कझगम (TVK) द्वारा दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान आई, जिसमें BLO के खिलाफ आरपी एक्ट की धारा 32 के तहत की जा रही दंडात्मक कार्रवाइयों पर रोक लगाने की मांग की गई थी।
TVK की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उत्तर प्रदेश में BLO के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई हैं। उन्होंने तर्क दिया कि अधिकांश BLO आंगनबाड़ी कार्यकर्ता या शिक्षक हैं जिन्हें SIR जैसे तकनीकी कार्यों के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं दिया गया। कई कर्मचारियों को सुबह अपनी नियमित नौकरी करनी पड़ती है और रात में SIR का काम, जिससे भारी तनाव की स्थिति पैदा होती है। उन्होंने एक दर्दनाक घटना का उल्लेख भी किया जिसमें एक कर्मचारी को शादी में शामिल होने की छुट्टी नहीं दी गई, उसे निलंबित कर दिया गया और निराशा में उसने आत्महत्या कर ली। ऐसे मामलों में कर्मचारियों पर आपराधिक कार्रवाई को अधिवक्ता ने कठोर और अमानवीय बताया।
इन दलीलों पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग देशभर में अकेले SIR जैसी विशाल प्रक्रिया पूरी नहीं कर सकता और उसे राज्य सरकारों के कर्मचारियों की सहायता की आवश्यकता होती है। इसलिए राज्य सरकारें इस जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकतीं। अदालत ने यह समाधान सुझाया कि यदि किसी कर्मचारी की व्यक्तिगत कठिनाइयाँ हैं, तो उसकी जगह किसी अन्य कर्मचारी की नियुक्ति की जा सकती है।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने यह सवाल भी उठाया कि जब उत्तर प्रदेश में चुनाव 2027 में होने हैं, तो SIR प्रक्रिया को केवल एक महीने में पूरा करने का दबाव क्यों बनाया जा रहा है। उनकी आपत्ति पर चुनाव आयोग की ओर से बताया गया कि तमिलनाडु जैसे राज्यों में 90 प्रतिशत से अधिक फॉर्म वितरित हो चुके हैं और कार्रवाई केवल उन्हीं मामलों में की गई है जहां BLO ने अपने कर्तव्यों का पालन करने से इनकार किया या गंभीर लापरवाही बरती।
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सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि चाहे बोझ कितना भी हो, SIR कार्यों का निर्वहन करना सरकारी कर्मचारियों का कर्तव्य है। लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि यह कर्तव्य मानवीय, संतुलित और व्यवहारिक रूप से निभाया जा सके।








