हत्या के मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया है। पुलिस की इस तरह की थ्योरी टिकाऊ नहीं।
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दिल्ली। हत्या के मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की जांच पर सवालिया निशान उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि मृतक के साथ आरोपी को आखिरी बार देख जाने की थ्योरी अब नहीं चलेगी। आखिरी बार देखे जाने के साथ ही हत्या को साबित करने वाला पुख्ता सबूत पेश करना होगा। इसके बिना सजा को कायम नहीं रखा जा सकता। इस टिप्पणी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया है।

हत्या के आरोप में छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा को चुनौती देते हुए मनोज उर्फ मुन्ना ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में अपील पेश की थी। अपीलकर्ता ने अपने आपको निर्दोष बताया था। मामले की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को पूरी तरह परिस्थितिजन्य सबूतों पर आधारित अभियोजन का मामला मानते हुए अपीलकर्ता की सजा को रद्द कर दिया है। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस संजय करोल व जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की डिवीजन बेंच ने कहा कि अन्य पुख्ता सबूतों की गैरमौजूदगी में मृतक के पास अपीलकर्ता को सिर्फ आखिरी बार देखे जाने की थ्योरी के आधार पर सजा को कायम नहीं रखा जा सकता। डिवीजन बेंच ने हत्या के आरोप में हाई कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए गए अपीलकर्ता की अपील को मंज़ूर करते हुए कहा, यह एक ऐसा मामला है, जहां आखिरी बार साथ देखे जाने के सबूत के अलावा, अपीलकर्ता के खिलाफ कोई अन्य पुख्ता सबूत पुलिस के पास नहीं है या फिर पुलिस अन्य पुख्ता सबूत जुटा नहीं पाई है। इसलिए केवल आखिरी बार साथ देखे जाने के आधार पर सज़ा को कायम नहीं रखा जा सकता।

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मामला हत्या से जुड़ा है। मृतक के शरीर पर चोटों के निशान थे, शरीर पर कई जगह गहरे घाव थे। जलाया भी गया था। पुलिस की जांच में पैसे के लिए ट्रैक्टर की चोरी और मृतक के साथ अपीलकर्ता को आखिरी बार देखे जाने की थ्योरी ही थी। गवाहों ने गवाही दी थी कि 6 जून, 2004 की शाम को अपीलकर्ता और एक सह-आरोपी को आखिरी बार मृतक को मोटरसाइकिल पर ले जाते हुए देखा गया था। इसके बाद मृतक को जिंदा नहीं देखा गया। इसी आधार पर पुलिस ने अपीलकर्ता को हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर ट्रायल कोर्ट में चालान पेश किया। मामले की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई। ट्रायल कोर्ट के फैसले को अपीलकर्ता ने हाई कोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी।

सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का फैसला

मामले की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट के डिवीजन बेंच ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा ने अपने फैसले में कन्हैया लाल बनाम राजस्थान राज्य, (2014) 4 SCC 715 का हवाला देते हुए कहा कि अपीलकर्ता को केवल इस आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता कि अपीलकर्ता को मृतक के साथ आखिरी बार देखा गया। ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने सबूत अधिनियम की धारा 106 के तहत अपीलकर्ता पर सबूत का पूरा बोझ डालकर गलती की, जब अभियोजन पक्ष ने अपराध से आरोपी को जोड़ने वाली घटनाओं की श्रृंखला को सफलतापूर्वक साबित करने के लिए सबूत का अपना शुरुआती बोझ पूरा नहीं किया, जहां आरोपी के खिलाफ एक उचित अनुमान लगाया गया था।

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कोर्ट ने कहा, धारा 106, यह केवल उन स्थितियों में लागू होती है, जहां अभियोजन पक्ष ने पहले ही आरोपी के खिलाफ एक उचित अनुमान स्थापित कर दिया हो। अपीलकर्ता के खिलाफ उपलब्ध परिस्थितिजन्य सबूतों की प्रकृति से हालांकि यह शक पैदा होता है कि उसने अपराध किया होगा, लेकिन यह इतना पक्का नहीं है कि उसे सिर्फ़ आखिरी बार साथ देखे जाने के सबूत के आधार पर दोषी ठहराया जा सके। चाहे जो भी हो। यह एक तय बात है कि जब भी कोर्ट के मन में कोई शक पैदा होता है तो इसका फ़ायदा आरोपी को मिलेगा, न कि अभियोजन पक्ष को। यह ऐसा मामला है, जहां आखिरी बार साथ देखे जाने के सबूत के अलावा, अपीलकर्ता के खिलाफ कोई और पुख्ता सबूत नहीं है। इसलिए सिर्फ़ आखिरी बार साथ देखे जाने के आधार पर सज़ा को बरकरार नहीं रखा जा सकता। इस टिप्पणी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता की अपील को स्वीकार करते हुए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के फैसे को खारिज कर दिया है।


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