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6 साल से मुकदमा लड़ने वालों को बाहर होने का खतरा, जो घर बैठे हैं उनको मिल जाएगी नौकरी, पढ़िए क्या है कारण

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बिलासपुर। रिव्यू याचिका दायर करने वाले अभ्यर्थियों ने सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का हवाला दिया है जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कैट में आवेदन दायर करने वाले अभ्यर्थियों को नौकरी देने का आदेश दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे SECR को दिया थ। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर रेलवे ने कैट में मामला दायर करने वाले सभी 197 अभ्यर्थियों को नौकरी दे दी थी। इसी आधार पर याचिकाकर्ताओं ने नौकरी देने की मांग हाई कोर्ट से की है।

क्या है मामला

दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे बिलासपुर SECR में 2010 में 5540 ग्रुप-डी के पदों हेतु विज्ञापन जारी किया गया था, चयन के पश्चात रेलवे ने सभी 5540 अभ्यर्थियों को लिखित परीक्षा के मेरिट के आधार पर नियुक्ति-पत्र प्रदान किया था। इंनमे से 624 अभ्यर्थियों ने नौकरी ज्वाइन नहीं की। रिक्त पदों पर प्रतीक्षा सूची के अभ्यर्थियों को रेलवे के 2008 के नियम के अनुसार नियुक्ति-पत्र देना था, लेकिन रेलवे ने ऐसा नहीं किया। 2014 से 2019 के बीच तकरीबन 197 प्रतीक्षा सूची के अभ्यर्थियों ने कैट बिलासपुर में याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई के बाद कैट ने याचिका खारिज कर दी थी। इनमें से 110 अभ्यर्थियों ने कैट के फैसले को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी थी।

हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती

हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में दिनेश कुमार कश्यप एवं अन्य विरुद्ध रेलवे के मामले की सुनवाई के बाद उन अभ्यर्थियों, याचिकाकर्ताओं के पक्ष में आदेश पारित किया की जिसने कैट में केस दर्ज किया था, ऐसे अभ्यर्थियों को नौकरी देने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर रेलवे ने 197 अभ्यर्थियों को जिन्होंने कैट में प्रकरण दर्ज किया था को रेलवे ने नियुक्ति पत्र जारी किया था।

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इसके बाद भी अलग-अलग श्रेणी 624-197-427 खाली पदों को भी प्रतीक्षा सूची से ही भरने के लिए पुनः 2019 से 2023 तक तकरीबन 300 प्रतीक्षा सूची के 60 अभ्यर्थियों के द्वारा कैट बिलासपुर एवं जबलपुर बेंच में याचिका दायर की। मामले की सुनवाई के बाद कैट ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाते हुए नौकरी देने रेलवे को आदेश जारी किया।

CAT के आदेश को रेलवे ने हाई कोर्ट में दी थी चुनौती

रेलवे ने कैट के आदेश को हाई कोर्ट में 54 याचिकाओं के माध्यम से चुनौती दी थी, उन याचिकाओं का हाई कोर्ट ने 5 दिसंबर 2025 निर्णय करते हुए रेलवे द्वारा दायर किये गए सभी 54 याचिकाओं को खारिज करते हुए पुनः मामले को रेलवे को सौंपते हुए 4 माह में समिति के माध्यम से रिक्त पदों की जानकारी होने पर प्रतीक्षा सूची के अभ्यर्थियों को मेरिट के आधार पर नियुक्ति देने का आदेश पारित किया है।

इसलिए दायर की है रिव्यू पिटिशन, ये की है मांग

रेलवे द्वारा 2010 के नियुक्ति के सम्बन्ध में 1335 अभ्यर्थियों का प्रतीक्षा-सूची है जिनमे से सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार 197 अभ्यर्थियों को नियुक्ति-पत्र दिए गए थे, इस प्रकार प्रतीक्षा सूची में करीब 1138 अभ्यर्थियों का नाम होने पर अभी रेलवे के 2010 के विज्ञापन के अनुसार करीब 427 पद ही रिक्त है तो फिर हाई कोर्ट के 5 दिसंबर 2025 के आदेशानुसार उन 427 रिक्त पदों को भरने के लिए रेलवे 1138 प्रतीक्षा-सूची उम्मीदवारों को मेरिट के हिसाब से ही बुलाएगा, तो फिर 2019 से कैट में केस लगाकर नौकरी का इंतज़ार करने वाले वाले अभ्यर्थियों जिनका मेरिट लिस्ट में नीचे स्थान होने के कारण इन अभ्यर्थियों की जगह उन अभ्यर्थियों को जिन्होंने अभी तक कोई कोर्ट में केस नहीं लगाया है लेकिन उनके मेरिट लिस्ट में ज्यादा अंक होने के कारण वे ऊपर होने के कारण उनको नौकरी मिलने की संभावना बन रही हैं, इसी को ध्यान में रखते हुए एक अभ्यर्थी ने पुनः हाई कोर्ट में उनके 5 दिसंबर.2025 के आदेश में आवश्यक सुधार हेतु रिव्यू याचिका दायर की है जो लंबित है।

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ये है हाई कोर्ट का आदेश

  • यदि रिक्तियों की ऑडिट से यह सिद्ध होता है कि एसईसीआर द्वारा तैयार की गई प्रतिस्थापन सूची से एक या अधिक रिक्तियां वैध रूप से भरी जानी बाकी हैं, तो रेलवे उस प्रतिस्थापन सूची में शामिल पात्र उम्मीदवारों के नामों पर योग्यता क्रम के अनुसार विचार करेगा और प्रस्ताव पत्र जारी करने से पहले प्रत्येक उम्मीदवार की सामान्य विभागीय जांच (पूर्ववृत्त, चिकित्सा योग्यता, मूल दस्तावेजों का सत्यापन) करेगा। सामान्य पूर्ववृत्त और चिकित्सा योग्यता जांच पूरी किए बिना किसी भी उम्मीदवार को नियुक्त नहीं किया जाएगा।
  • यदि रिक्ति लेखा परीक्षा से यह पता चलता है कि किसी विशेष पद को बाद के भर्ती चक्र में विधिवत रूप से समाहित कर लिया गया है, तो वह पद 2010 की प्रतिस्थापन सूची से नई नियुक्ति के लिए उपलब्ध नहीं होगा; ऐसे मामलों में, विपरीत प्रमाण प्रस्तुत न किए जाने पर, रेलवे द्वारा दर्ज विधिवत समाहित होने की स्थिति ही मान्य होगी।
  • यदि उम्मीदवार का कोई दावा खारिज किया जाता है, तो रेलवे उसे सुनवाई का उचित अवसर प्रदान करने के बाद ऐसा दावा खारिज कर सकता है। ऐसी किसी भी अस्वीकृति के लिए लिखित कारण बताए जाएंगे और वह सामान्य न्यायिक समीक्षा के अधीन होगी।
  • रेलवे प्रशासनिक अभिलेख के भाग के रूप में रिक्ति-लेखापरीक्षा रिपोर्ट और इस प्रक्रिया के अंतर्गत विचार किए गए प्रत्येक उम्मीदवार के संबंध में सक्षम नियुक्ति प्राधिकारी द्वारा की गई कार्रवाई का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करेगा। जहां प्रस्ताव पत्र जारी किए जाते हैं, उनमें प्रतिस्थापन सूची के स्रोत का स्पष्ट उल्लेख होगा और वे सामान्य सत्यापन के अधीन होंगे।

पीड़ित पक्ष को दी छूट, CAT से कर सकेंगे संपर्क

यदि किसी पीड़ित पक्ष को लगता है कि रेलवे ने मनमाने ढंग से या प्रतिस्थापन सूची या कैट CAT के आदेश की आवश्यकताओं के विपरीत कार्य किया है, तो ऐसा पक्ष उचित निवारण के लिए CAT से संपर्क करने का हकदार होगा; पीड़ित पक्षों के लिए न्यायिक समीक्षा का उपाय खुला रहेगा।

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रेलवे की याचिका खारिज, डिवीजन बेंच ने दिया ये आदेश

मामले की सुनवाई के बाद जस्टिस रजनी दुबे व जस्टिस एके प्रसाद के डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में लिखा है कि उपरोक्त कारणों से और विधि द्वारा अनिवार्य रूप से सुव्यवस्थित सार्वजनिक भर्ती की आवश्यकता तथा योग्य उम्मीदवारों के मौलिक कानूनी अधिकारों के संरक्षण के बीच संतुलित दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए, भारत संघ/रेलवे द्वारा दायर रिट याचिकाएं खारिज की जाती हैं और 06 मार्च 2024 के CAT के सामान्य आदेश को इस हद तक बरकरार रखा जाता है कि इसमें रिक्त पदों की प्रशासनिक जांच और कानून तथा इन निर्देशों के अनुरूप प्रतिस्थापन सूची में योग्य उम्मीदवारों पर विचार करने का निर्देश दिया गया है। पक्षकार इस आदेश के अनुसार कार्य करेंगे।


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