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एसईसीएल ने एक अफसर को डिमोशन कर दिया, इंक्रीमेंट ब्रेक कर दिया, पढ़िए हाई कोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा है।

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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) को बड़ा झटका देते हुए एक अधिकारी के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई को असंवैधानिक करार दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि नियम और कानून के दायरे से बाहर जाकर दी गई कोई भी सजा कानून की दृष्टि में मान्य नहीं हो सकती। हाई कोर्ट ने एसईसीएल द्वारा किए गए डिमोशन और इंक्रीमेंट रोकने के आदेश को रद्द करते हुए संबंधित अधिकारी को वेतन, इंक्रीमेंट और अन्य सभी सेवा लाभ तीन महीने के भीतर बहाल करने का निर्देश दिया है।

यह मामला कोल इंडिया लिमिटेड की सहायक कंपनी एसईसीएल में पदस्थ लेखा अधिकारी रजनीश कुमार गौतम से जुड़ा है। याचिकाकर्ता को पूर्व सैनिकों की एजेंसियों से जुड़े कोल लोडिंग और परिवहन बिलों की बकाया राशि की कटौती और वसूली में कथित विफलता का दोषी ठहराते हुए विभागीय कार्रवाई की गई थी। विभागीय जांच के बाद एसईसीएल प्रबंधन ने उन्हें एक वर्ष के लिए निचले वेतनमान में डिमोशन कर दिया था और इसी अवधि के दौरान इंक्रीमेंट भी रोक दिया गया था।

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एसईसीएल के इस आदेश को चुनौती देते हुए रजनीश कुमार गौतम ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में याचिका दायर की। मामले की सुनवाई जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच में हुई। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रफुल्ल एन. भारत ने कोर्ट के समक्ष दलील दी कि जिस कार्य के लिए अधिकारी को दंडित किया गया, वह कार्य कभी भी औपचारिक रूप से उन्हें सौंपा ही नहीं गया था। इसके अलावा लगाया गया दंड कोल इंडिया के अधिकारियों पर लागू वैधानिक सेवा नियमों के भी विपरीत है।

कोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि सितंबर 2012 में जारी नोटशीट में दीपका विस्तार परियोजना के लेखा विभाग और क्षेत्रीय वित्त विभाग के बीच जिम्मेदारियों का स्पष्ट विभाजन किया गया था। इस दस्तावेज के अनुसार, कोल लोडिंग और परिवहन बिलों की ऑडिटिंग, जांच और स्वीकृति की जिम्मेदारी क्षेत्रीय वित्त विभाग की थी। याचिकाकर्ता की भूमिका केवल औपचारिक रूप से बिल प्राप्त करने और उन्हें आगे प्रेषित करने तक सीमित थी। रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला जिससे यह सिद्ध हो कि याचिकाकर्ता को बिलों की जांच या बकाया वसूली की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

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हाई कोर्ट ने अनुशासनात्मक प्राधिकारी की कार्रवाई पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि विभाग ने महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्देशों की अनदेखी की है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए दो टूक कहा कि किसी अधिकारी या कर्मचारी को उन कार्यों के लिए दंडित नहीं किया जा सकता, जो वैधानिक रूप से उसके कार्यक्षेत्र में आते ही नहीं हैं। ऐसी सजा न केवल मनमानी है, बल्कि कानून की मूल भावना के भी खिलाफ है। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट ने एसईसीएल द्वारा जारी दंड आदेश को रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को वेतन, रोका गया इंक्रीमेंट और अन्य सभी सेवा लाभ तीन महीने की अवधि के भीतर बहाल किए जाएं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुशासनात्मक कार्रवाई करते समय प्रशासन को वैधानिक नियमों और तय जिम्मेदारियों की सीमा का सख्ती से पालन करना होगा।


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