CG High Court News: शिक्षकों की याचिका पर हाई कोर्ट का बड़ा निर्देश: पूर्व सेवा को नहीं किया जा सकता नजरअंदाज
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CG High Court News: बिलासपुर। अतिथि शिक्षकों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि यदि किसी शिक्षक ने पूर्व में ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ सेवाएं दी हैं, तो नियमित भर्ती प्रक्रिया के दौरान उनके अनुभव को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि कोर्ट ने सीधे नियमितीकरण का आदेश देने से इनकार किया, लेकिन केंद्र और राज्य सरकार को उनके अनुभव को उचित महत्व देने का निर्देश दिया है।

43 अतिथि शिक्षकों की संयुक्त सुनवाई

सरोज कुमार गुप्ता, अनूपा तिर्की, देवेंद्र कुमार, थानेंद्र कुमार, श्वेता राठौर सहित कुल 43 याचिकाकर्ताओं ने अलग-अलग रिट याचिकाएं दायर की थीं। चूंकि सभी याचिकाओं में मुद्दा समान था, इसलिए हाई कोर्ट ने उन्हें एक साथ सुनवाई के लिए संयोजित कर दिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी, भरत लाल साहू, पलाश अग्रवाल, चंद्रदीप प्रसाद, विवेक कुमार अग्रवाल और भारती खूंटे ने पक्ष रखा।

इन याचिकाओं में नेशनल एजुकेशन सोसायटी फॉर ट्राइबल स्टूडेंट्स (NESTS) द्वारा एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों (EMRS) में शिक्षण एवं गैर-शिक्षण पदों के लिए जारी केंद्रीयकृत भर्ती विज्ञापन को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे वर्षों से EMRS में कार्यरत हैं, लेकिन नए विज्ञापन में उनके अनुभव और आजीविका की सुरक्षा पर कोई विचार नहीं किया गया।

क्या था याचिकाकर्ताओं का तर्क

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि EMRS दिशा-निर्देशों के अनुसार भर्ती का अधिकार राज्य स्तरीय EMRS सोसायटी या एकलव्य विद्यालय संगठन समिति के पास है। उनका कहना था कि NESTS को केंद्रीय स्तर पर भर्ती विज्ञापन जारी करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि इसके लिए वैधानिक रूप से दायित्व हस्तांतरित किए जाने का कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि वे सभी आवश्यक शैक्षणिक योग्यताएं रखते हैं और 2016 से 2024 के बीच विभिन्न जिलों में नियुक्त होकर लगातार सेवाएं दे रहे हैं। कई शिक्षकों ने छह वर्ष से अधिक की निर्बाध सेवा पूरी की है। बावजूद इसके, उनके नियमितीकरण या समायोजन पर कोई विचार नहीं किया गया।

राज्य और केंद्र का पक्ष

प्रतिवादियों की ओर से कहा गया कि अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति पूर्णतः अस्थायी प्रकृति की थी और किसी नियमित भर्ती प्रक्रिया के अंतर्गत नहीं की गई थी। EMRS को केंद्रीय क्षेत्र योजना घोषित किए जाने के बाद केंद्र सरकार ने NESTS के माध्यम से नियमित भर्ती का अधिकार ग्रहण कर लिया है। इसलिए केंद्रीय विज्ञापन को अवैध नहीं ठहराया जा सकता।

हाई कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

सुनवाई के बाद न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति अस्थायी थी और उन्हें नियमित पद का स्वाभाविक अधिकार प्राप्त नहीं है। इसलिए विज्ञापन रद्द करने या सीधे नियमितीकरण का आदेश देना सेवा कानून के सिद्धांतों के विपरीत होगा। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि दूरस्थ और आदिवासी क्षेत्रों में लंबे समय तक सेवा देने वाले शिक्षकों के अनुभव और योगदान को पूरी तरह अनदेखा करना न्यायोचित नहीं होगा। उनके अनुभव को उचित वेटेज (अंक) दिया जाना चाहिए, बशर्ते वे पात्रता शर्तों को पूरा करते हों।

केंद्र और राज्य सरकार को निर्देश

अदालत ने केंद्र सरकार, NESTS और राज्य सरकार को निर्देश दिया कि EMRS में लंबे समय से कार्यरत याचिकाकर्ताओं के मामलों पर पुनर्विचार किया जाए। नियमित भर्ती प्रक्रिया के दौरान उनके अनुभव को नीति और नियमों के अनुरूप वरीयता दी जाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आदेश नियमितीकरण या स्वतः समायोजन का निर्देश नहीं है, बल्कि केवल अनुभव को उचित महत्व देने का निर्देश है, ताकि वर्षों की सेवा व्यर्थ न हो जाए।


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