पढ़िए: क्या है छत्तीसगढ़ का नान घोटाला? दो रिटायर्ड IAS अफसरों का जेल तक पहुंचा मामला

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घोटाले की शुरुआत और छापेमारी

छत्तीसगढ़ का बहुचर्चित नान घोटाला (NAN Scam) फरवरी 2015 में उस समय सुर्खियों में आया जब आर्थिक अनियमितताओं की शिकायतों पर भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) और आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) ने एक साथ बड़ी कार्रवाई की। 12 फरवरी 2015 को रायपुर स्थित नागरिक आपूर्ति निगम (NAN) के मुख्यालय सहित 28 जगहों पर छापे डाले गए। इस दौरान हैरान कर देने वाली बरामदगी हुई। सिर्फ मुख्यालय से ही करीब 1.75 करोड़ रुपये नकद मिले, जबकि अलग-अलग स्थानों पर कुल मिलाकर 3.50 करोड़ रुपये जब्त किए गए। साथ ही कई अहम दस्तावेज और लेन-देन से जुड़े कागज भी मिले, जिन्होंने गड़बड़ी का पूरा नेटवर्क उजागर कर दिया।

जांच और आरोप पत्र

जांच आगे बढ़ने पर पता चला कि खाद्यान्न के परिवहन और भंडारण में बड़े पैमाने पर धांधली की गई थी। भ्रष्टाचार कर करोड़ों का हेरफेर किया गया। ACB ने जांच पूरी कर NAN के तत्कालीन मैनेजर समेत 16 लोगों के खिलाफ चार्जशीट पेश की। इस चार्जशीट में 213 गवाह बनाए गए और इसका आकार लगभग 5000 पन्नों का था। बाद में केंद्र सरकार से अनुमति मिलने के बाद इस मामले में दो वरिष्ठ IAS अधिकारी – आलोक शुक्ला और अनिल टुटेजा – के नाम भी आरोपियों की सूची में जोड़े गए।

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IAS अधिकारियों पर आरोप

आलोक शुक्ला उस समय खाद्य विभाग के प्रमुख सचिव थे और पेशे से डॉक्टर रह चुके हैं। वहीं, अनिल टुटेजा नागरिक आपूर्ति निगम (NAN) के प्रबंध निदेशक (MD) थे। दोनों पर आरोप है कि उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर जांच को प्रभावित करने की कोशिश की। यहां तक कि आरोप है कि तत्कालीन महाधिवक्ता से मिलकर अपने पक्ष में जवाब तैयार करवाए और पूरे मामले को कमजोर करने की कोशिश की। यही वजह रही कि इन पर पूरक चालान पेश किया गया और केस लगातार अदालत में चर्चा का विषय बना रहा।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश और सरेंडर

मामले में पहले हाईकोर्ट ने दोनों को जमानत दे दी थी, लेकिन प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। ED का कहना था कि जांच अभी पूरी नहीं हुई है और आरोपियों ने पहले भी जांच को प्रभावित करने की कोशिश की है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच – जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा – ने सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की दी हुई अग्रिम जमानत रद्द कर दी। आदेश में कहा गया कि दोनों पूर्व IAS अधिकारियों को पहले 2 हफ्ते ED की कस्टडी में रहना होगा और उसके बाद 2 हफ्ते न्यायिक हिरासत में। तभी उन्हें आगे जमानत मिल सकेगी।

इसी आदेश के बाद आलोक शुक्ला और अनिल टुटेजा ने रायपुर की ED कोर्ट में सरेंडर किया। आलोक शुक्ला को सरेंडर करने के लिए कई बार कोर्ट आना पड़ा, क्योंकि कभी सुप्रीम कोर्ट का आदेश अपलोड नहीं हुआ था, तो कभी ED के वकील केस डायरी लेकर नहीं पहुंचे। आखिरकार तीसरी कोशिश में कोर्ट में सरेंडर की प्रक्रिया पूरी हो सकी।

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ED की कस्टडी और जांच की समय सीमा

सरेंडर के बाद दोनों अफसरों को 16 अक्टूबर तक ED की कस्टडी में भेजा गया है। दिल्ली मुख्यालय में उनसे पूछताछ की जाएगी, जहां ED अधिकारियों को उम्मीद है कि घोटाले के और पहलू उजागर हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ED को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वह तीन महीने के भीतर अपनी जांच पूरी करे, वहीं EOW को दो महीने की समय सीमा दी गई है। अदालत ने यह भी कहा कि लंबे समय से लंबित इस मामले में देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

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घोटाले का असर और राजनीतिक महत्व

नान घोटाला सिर्फ आर्थिक अनियमितता का मामला नहीं रहा, बल्कि इसने छत्तीसगढ़ की राजनीति को भी गहराई से प्रभावित किया। इसमें नौकरशाहों के साथ-साथ कई बड़े नेताओं के नाम भी अप्रत्यक्ष तौर पर चर्चा में आए। विपक्ष ने इसे सरकार की नाकामी बताया, जबकि सरकार ने कहा कि कानूनी प्रक्रिया के तहत ही कार्रवाई होगी।

आज जब दो रिटायर्ड IAS अधिकारी फिर से जेल की राह पर हैं, तब सवाल उठ रहा है कि क्या इस घोटाले में शामिल बाकी जिम्मेदार लोगों तक भी जांच पहुंचेगी या नहीं। ED और EOW की अगली कार्यवाही इस बात का संकेत देगी कि आने वाले समय में छत्तीसगढ़ की राजनीति और प्रशासन पर इस घोटाले का कितना गहरा असर पड़ेगा।


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