जिला अध्यक्षों की नियुक्ति में, सृजन की बजाय कांग्रेस नेताओं की अपनी-अपनी पसंद चली

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बिलासपुर। सृजन के लिए तय फार्मूले की जगह प्रदेश के दिग्गज नेताओं की पसंद के नाम ज्यादा, बिलासपुर जिले में देवेंद्र की चल गई, हर संभाग में जातिगत समीकरण को भी ध्यान में रखा गया है। छत्तीसगढ़ कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष दीपक बैज ने जिला व शहर अध्यक्षों के रूप में नई टीम मिल गई है। संगठन सृजन के बजाय इसे उलटफेर कहना ज्यादा सरल और सहज होगा। बिलासपुर संभागीय मुख्यालय से सहित जिलों में जो नाम सामने आए हैं उसे देखकर तो यही लगता है कि कांग्रेस नेताओं की पंसद को आलाकमान ने ज्यादा तव्वजो दी है।

जाहिर सी बात है जब बड़े नेताओं की पसंद नापसंदगी को ध्यान में रखा जाएगा तो इसी अंदाज में उलटफेर देखने को मिलेगा। बिलासपुर जिले में जो नाम चल रहा था या जिनकी दावेदारी मजबूत मानी जा रही थी, सभी दरकिनार कर दिए गए। या यूं कहें कि जातिगत राजनीति के बहाने दावेदारी को हाशिए पर डाल दिया गया। संगठन सृजन के दौर से ही यह कयास लगाए जा रहे थे कि शहर को ब्राम्हण और जिले को ओबीसी अध्यक्ष मिलेगा। सृजन में एक कदम और आगे बढ़कर शहर में ब्राम्हण अध्यक्ष तो दिए ग्रामीण में ओबीसीकी दावेदारी को किनारे रखते हुए अजा वर्ग की मजबूत दावेदारी को सामने रखा गया है।

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शहर व जिला अध्यक्ष की नियुक्ति के बाद से ही इस बात के कयास लगाए जा रहे हैं कि दोनों चेहरे आखिर किस गुट से ताल्लुक रखते हैं। या ऐसा भी कह सकते हैं कि अध्यक्ष बनाने में किसने सियासीतौर पर बाजी मार ली है। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद से ही बिलासपुर जिले का कांग्रेस की राजनीति में एक अलग ही महत्व रहते आया है। तब पूर्व मुख्यमंत्री स्व अजीत जोगी के चलते छत्तीसगढ़ की कांग्रेस राजनीति में बिलासपुर जिले का रूतबा बढ़ा। कांग्रेस की राजनीति में बिलासपुर जिले के संगठन से लेकर सत्ता में हिस्सेदारी में कौन-कौन चेहरे नजर आएंगे और कौन भागीदारी करेगा, यह सब अजीत जोगी तय किया करते थे। घोषित रूप से यह जोगी का गृह जिला हुआ करता था। यही कारण है कि कांग्रेस के बड़े नेता दखलंदाजी नहीं करते थे। जोगी के कांग्रेस की राजनीति से रुखसत होने के बाद नेता प्रतिपक्ष डा चरणदास महंत का असर नजर आया।

बड़ी संख्या में उनके समर्थकों की फौज इस बात के गवाह है। हालिया संगठन सृजन में जिला अध्यक्षों के नाम में उलटफेर तो देखने को मिला साथ ही बिलासपुर जिले की राजनीति में भी एक बड़ा और असरकारक बदलाव अब जाकर नजर आने लगा है। शहर अध्यक्ष सिद्धांशु मिश्रा व जिला अध्यक्ष महेंद्र गंगोत्री की ताजपोशी के पीछे भिलाई के विधायक देवेंद्र यादव की दखलंदाजी मानी जा रही है। हाल ही में यूथ कांग्रेस के कार्यकारी जिलाध्यक्ष की नियुक्ति में देवेंद्र ने जैसी अपनी चलाई थी, तभी से ही इस बात के संकेत मिलने लगे थे कि बिलासपुर जिले के शहर व जिलाध्यक्ष उनके कोटे में चला जाएगा। हुआ भी यही। दरअसल देवेंद्र यादव बिलासपुर लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस के प्रत्याशी थी। इसी हैसियत ने उन्होंने बिलासपुर जिले की राजनीति में अब दमदार तरीके से इंट्री कर ली है।

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कांग्रेसी राजनीति के जानकारों का तो यहां तक कहना है कि जिले में सामान्य वर्ग और ओबीसी गठजोड़ को आगे बढ़ाने तमाम बड़े नेता राजी हो गए थे। देवेंद्र के खेमे में ऐसा बड़ा ओबीसी चेहरा नहीं था जिसे जिला अध्यक्ष के लिए आगे बढ़ाते, जिनकी दावेदारी थी उन पर सियासीतौर पर भरोसा नहीं हो रहा था। जिले की सियासी हालत और अजा बहुलता का दांव खेला गया और महेंद्र गंगोत्री का नाम आगे बढ़ा दिया।

कभी डा महंत खेमे में आते थे नजर

नवनियुक्त जिला अध्यक्ष महेंद्र गंगोत्री कभी डा चरणदास महंत में नजर आया करते थे। महेंद्र की सियासी प्रतिबद्धता बदली और लोकसभा चुनाव के दौर में देवेंद्र के साथ हो लिए। जानकारों का तो यहां तक कहना है कि यूथ कांग्रेस की राजनीति में महेंद्र गंगोत्री देवेंद्र यादव के सीनियर हुआ करते थे। जूनियर सीनियर का गठजोड़ लोकसभा चुनाव में नजर आया था। लोकसभा चुनाव में महेंद्र गंगोत्री की सियासी प्रतिबद्धता के कायल देवेंद्र यादव ने आखिर समय में अपना पत्ता खोला और जिला अध्यक्ष की कुर्सी के लिए महेंद्र का नाम आगे बढ़ा दिया। अजा जाति वर्ग का बड़ा चेहरा के साथ ही यूथ कांग्रेस की राजनीति के जानकारी महेंद्र की दावेदारी को चाहकर भी बड़े नेता नकार नहीं पाए।


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