दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने नौकरी, डिग्री और विषयगत योग्यता से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट कर दिया है कि किसी उम्मीदवार को सिर्फ इसलिए नौकरी से नहीं निकाला जा सकता कि उसकी औपचारिक डिग्री किसी अन्य विषय में है, जबकि उसने अपने पाठ्यक्रम में आवश्यक मुख्य विषय की पढ़ाई की हो। यह फैसला उन स्थितियों को लेकर बेहद अहम माना जा रहा है जहां नियुक्ति प्रक्रिया में पद के लिए मांगी गई विशेष डिग्री का तकनीकी अर्थ निकालकर योग्य उम्मीदवारों को बाहर कर दिया जाता है। अदालत ने कहा कि किसी भी योग्यता की व्याख्या करते समय उसके उद्देश्य और संदर्भ पर ध्यान देना आवश्यक है, न कि केवल डिग्री के शीर्षक पर।
यह फैसला जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने दिया, जिसमें मध्य प्रदेश के एक मॉनिटरिंग और इवैल्यूएशन कंसल्टेंट की बर्खास्तगी को गलत ठहराते हुए उसकी नौकरी बहाल कर दी गई। यह पद नवंबर 2012 के विज्ञापन के तहत भरा जाना था, जिसमें “स्टैटिस्टिक्स में पोस्टग्रेजुएट डिग्री” की अनिवार्यता तय की गई थी। याचिकाकर्ता लक्ष्मीकांत शर्मा एम.कॉम स्नातक थे, जिन्होंने अपने पाठ्यक्रम में बिज़नेस स्टैटिस्टिक्स और इंडियन इकोनॉमिक स्टैटिस्टिक्स को मुख्य विषय के रूप में पढ़ा था। उन्हें 2013 में संविदा के आधार पर नियुक्त किया गया था। एक वर्ष बाद आठ सदस्यीय समिति ने यह कहते हुए उनकी सेवा समाप्त कर दी कि वे निर्धारित योग्यता को पूरा नहीं करते क्योंकि उनके पास औपचारिक रूप से स्टैटिस्टिक्स विषय में पीजी डिग्री नहीं है।
Also Read – जीएडी ने साफ कहा: दस्तावेजों की जांच के बाद ही जारी करें ज्वाइनिंग आदेश
मामला मध्य प्रदेश हाई कोर्ट पहुंचा, जहां बार-बार राज्य सरकार के बर्खास्तगी आदेश को रद्द किया गया। लेकिन राज्य सरकार ने वही पुराना आधार देते हुए उनकी सेवा समाप्ति का आदेश फिर जारी कर दिया। अंततः लक्ष्मीकांत शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि मध्य प्रदेश की किसी भी सरकारी विश्वविद्यालय में “एम.कॉम स्टैटिस्टिक्स” नाम की कोई पोस्टग्रेजुएट डिग्री उपलब्ध ही नहीं है। ऐसे में विज्ञापन की शर्त का शब्दशः पालन करना असंभव मानक स्थापित कर देता है। अदालत ने टिप्पणी की कि योग्यता की ऐसी व्याख्या करना जिसमें ऐसी डिग्री की मांग की जाए जो वस्तुतः अस्तित्व में ही नहीं है, यह न केवल मनमाना है बल्कि अवास्तविक भी।
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि “स्टैटिस्टिक्स में पोस्टग्रेजुएट डिग्री” शब्द को उसके व्यापक और उद्देश्यपूर्ण संदर्भ में समझा जाना चाहिए। इसमें वे सभी स्नातकोत्तर डिग्रियाँ शामिल होनी चाहिए जिनमें स्टैटिस्टिक्स एक मुख्य, अनिवार्य या प्रमुख विषय के रूप में शामिल हो। अदालत ने कहा कि करिकुलम की वास्तविक सामग्री को देखे बिना केवल डिग्री की औपचारिकता पर जोर देना उचित नहीं है। यह दृष्टिकोण केवल रूप को महत्व देता है, न कि वास्तविक योग्यता को।
Also Read – हाई कोर्ट ने दो सप्ताह में निर्णय लेने दिया था निर्देश, फाइल कहां दबी या दबा दी गई, पता ही नहीं?
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब कोई संविदा कर्मचारी केवल “अयोग्यता” के आधार पर बर्खास्त किया जा रहा हो तो अदालत यह जांचने के लिए बाध्य है कि क्या वाकई वह अयोग्यता वैध, तर्कसंगत और प्रमाणित है। इस मामले में यह पाया गया कि याचिकाकर्ता ने स्टैटिस्टिक्स विषय की वह आवश्यक पढ़ाई की थी जो इस पद के दायित्वों को पूरा करने के लिए आवश्यक थी। सिर्फ इसलिए कि उसकी डिग्री का शीर्षक किसी अन्य विषय कॉमर्स से संबद्ध है, उसे अपात्र नहीं ठहराया जा सकता।
अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि नौकरी से निकाला जाना गलत था क्योंकि विज्ञापन में मांगी गई योग्यता का अर्थ व्यवहारिक और संदर्भित तरीके से समझा जाना चाहिए था। अदालत ने कहा कि यदि किसी पद के लिए ऐसी डिग्री मांगी जाती है जो किसी भी सरकारी विश्वविद्यालय में उपलब्ध ही नहीं है, तो यह पूरी भर्ती प्रक्रिया को अव्यावहारिक बना देता है। इसलिए, यह तर्क स्वीकार्य नहीं है कि उम्मीदवार को केवल औपचारिक “स्टैटिस्टिक्स” शीर्षक वाली डिग्री न होने के कारण अयोग्य माना जाए।
Also Read – DPI और हाई कोर्ट के आदेश का डीईओ ने उड़ाई धज्जियां, मनचाहे स्कूलों में शिक्षकों की कर दी पोस्टिंग
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता की सेवाएं बहाल करने का आदेश दिया। यह फैसला केवल एक व्यक्ति के रोजगार से संबंधित नहीं, बल्कि उन सभी मामलों के लिए मिसाल बन गया है जहां उम्मीदवारों को केवल डिग्री शीर्षक के आधार पर बाहर कर दिया जाता है, जबकि उन्होंने अपने पाठ्यक्रम में वही विषय पढ़ा होता है जिसकी नौकरी में आवश्यकता है। अदालत का यह भी कहना था कि योग्यता की शर्तों को उनकी भावना और उद्देश्य के अनुसार पढ़ा जाना चाहिए, न कि उनके शाब्दिक और संकुचित अर्थ के आधार पर। इस तरह, यह फैसला भविष्य में नियुक्ति प्रक्रियाओं को अधिक तार्किक, न्यायसंगत और व्यावहारिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।








