नई दिल्ली। कॉमन लॉ एडमिशन टेस्ट (CLAT) 2026 के प्रश्न पत्र और आंसर-की लीक होने के आरोपों को लेकर मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। याचिकाकर्ताओं ने शीर्ष अदालत में याचिका दायर कर इस पूरे मामले की कोर्ट की निगरानी में समयबद्ध और निष्पक्ष जांच की मांग की है। साथ ही यह भी आग्रह किया गया है कि यदि जांच में पेपर लीक या गंभीर गड़बड़ी की पुष्टि होती है, तो CLAT 2026 की परीक्षा को रद्द कर नए सिरे से परीक्षा आयोजित कराई जाए।
याचिका में बताया गया है कि CLAT 2026 की परीक्षा 7 दिसंबर को आयोजित हुई थी, जबकि पहली आवंटन सूची बुधवार 7 जनवरी को जारी होने वाली है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यदि बिना स्वतंत्र जांच के काउंसलिंग प्रक्रिया शुरू कर दी जाती है और सीटों का आवंटन हो जाता है, तो बड़ी संख्या में योग्य अभ्यर्थी अपने अधिकार से वंचित हो जाएंगे। यह याचिका अनुसूचित जाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के CLAT उम्मीदवारों के एक समूह द्वारा दायर की गई है। याचिकाकर्ताओं ने आशंका जताई है कि पेपर लीक की वजह से परीक्षा की निष्पक्षता और समान अवसर के संवैधानिक सिद्धांत का गंभीर उल्लंघन हुआ है। उनका कहना है कि किसी भी सार्वजनिक प्रतियोगी परीक्षा में सभी अभ्यर्थियों को समान अवसर मिलना अनिवार्य है, लेकिन CLAT 2026 के मामले में सोशल मीडिया पर वायरल सामग्री ने परीक्षा की पवित्रता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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याचिका में कहा गया है कि 6 दिसंबर को, यानी परीक्षा से लगभग 15 घंटे पहले, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तिथि और समय-स्टैम्प वाली तस्वीरें और वीडियो सर्कुलेट होने लगे थे। इनमें कुछ छात्रों के कथित बयान शामिल थे, जो अवैध रूप से प्रश्न पत्र हासिल करने का दावा कर रहे थे। इसके अलावा, एक व्यक्ति के संदेश भी वायरल हुए, जिसमें कुछ रकम के बदले CLAT का प्रश्न पत्र उपलब्ध कराने की पेशकश की गई थी। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इस ऑनलाइन सामग्री का पैमाना और समय परीक्षा से पहले ही लीक की गंभीर संभावना की ओर इशारा करता है। परीक्षा के बाद नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज़ (NLUs) के कंसोर्टियम ने शिकायतों के निवारण के लिए एक ऑनलाइन ग्रिवांस रिड्रेसल पोर्टल शुरू किया था। हालांकि, याचिका में कहा गया है कि कई उम्मीदवारों ने इस पोर्टल के माध्यम से पेपर लीक को लेकर शिकायतें दर्ज कराईं, लेकिन अब तक न तो कोई विस्तृत जांच रिपोर्ट सामने आई है और न ही इस पर कोई स्पष्ट सार्वजनिक स्पष्टीकरण दिया गया है। इससे छात्रों में असमंजस और चिंता की स्थिति बनी हुई है।
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याचिकाकर्ताओं ने अपनी दलीलों के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के अहम फैसलों का भी हवाला दिया है। इनमें तन्वी सरवाल बनाम CBSE और निधि कैम बनाम मध्य प्रदेश राज्य जैसे मामलों का उल्लेख किया गया है। याचिका में विशेष रूप से ऑल इंडिया प्री-मेडिकल टेस्ट (AIPMT) 2015 का उदाहरण दिया गया है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने पेपर लीक और अनियमितताओं के चलते रद्द कर दोबारा परीक्षा आयोजित करने का आदेश दिया था। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि CLAT 2026 का मामला भी उसी तरह की गंभीरता का है और इसमें भी समान सिद्धांत लागू होने चाहिए। याचिका में यह भी कहा गया है कि यदि इस स्तर पर हस्तक्षेप नहीं किया गया, तो परीक्षा प्रणाली में छात्रों का विश्वास कमजोर होगा और भविष्य में भी इस तरह की अनियमितताओं को बढ़ावा मिलेगा। याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि वह पहली आवंटन सूची और आगे की काउंसलिंग प्रक्रिया पर रोक लगाए, जब तक कि पेपर लीक के आरोपों की निष्पक्ष जांच पूरी न हो जाए।








