कांट्रैक्ट कर्मचारियों के लिए सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला, पढ़िए सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा है।

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दिल्ली। कांट्रैक्ट कर्मचारियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम और दूरगामी फैसला सुनाया है। लंबे समय से स्वीकृत पदों पर सेवाएं दे रहे कर्मचारियों के पक्ष में स्पष्ट रुख अपनाते हुए कोर्ट ने कहा है कि केवल “कांट्रैक्ट” का आधार बनाकर नियमित नियुक्ति से इनकार नहीं किया जा सकता। यदि कर्मचारी चयन प्रक्रिया के बाद नियुक्त हुए हों, वर्षों तक संतोषजनक कार्य किया हो और लगातार सेवावृद्धि पाते रहे हों, तो वे नियमितीकरण की मांग करने के हकदार हैं।

भोलानाथ सहित अन्य याचिकाकर्ताओं की याचिका पर सुनवाई करते हुए Supreme Court of India की डिवीजन बेंच ने टिप्पणी की कि राज्य सरकार ने एक दशक से अधिक समय तक स्वीकृत पदों पर याचिकाकर्ताओं की सेवाओं का लाभ लिया है। अच्छे कार्य के आधार पर उन्हें बार-बार सेवावृद्धि भी दी गई, ऐसे में औपचारिक कांट्रैक्ट शर्तों का सहारा लेकर अचानक सेवाएं समाप्त करना न सिर्फ मनमाना है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14 की कसौटी पर भी खरा नहीं उतरता।

कोर्ट ने कहा कि जिन कर्मचारियों को लंबे समय तक, बिना किसी ठोस कारण के, स्वीकृत रिक्त पदों पर बनाए रखा गया हो, उन्हें नियमितीकरण के अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता। केवल यह तर्क कि नियुक्ति कांट्रैक्ट आधार पर थी, राज्य सरकार को जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे कर्मचारियों की याचिका स्वीकार करते हुए झारखंड सरकार को उनके नियमितीकरण का आदेश दिया है।

मामला क्या था

याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति वर्ष 2012 में राज्य के भूमि संरक्षण निदेशालय में 22 स्वीकृत पदों के विरुद्ध जूनियर इंजीनियर (कृषि) के रूप में सार्वजनिक विज्ञापन और चयन प्रक्रिया के बाद की गई थी। शुरुआत में नियुक्ति एक वर्ष के लिए कांट्रैक्ट पर हुई, लेकिन संतोषजनक कार्य के आधार पर उनकी सेवाएं दस साल से अधिक समय तक बढ़ाई जाती रहीं। वर्ष 2023 में राज्य सरकार ने अचानक सेवावृद्धि को अंतिम बताते हुए उनकी सेवाएं समाप्त कर दीं।

इस निर्णय को चुनौती देते हुए इंजीनियरों ने पहले झारखंड हाई कोर्ट का रुख किया, जहां उनकी याचिका खारिज कर दी गई। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए स्पष्ट कहा कि राज्य अपने कर्मचारियों की मजबूरी या असमान मोलभाव की स्थिति का लाभ नहीं उठा सकता। बिना ठोस कारण या विधिसम्मत आदेश के, इतनी लंबी सेवा को अचानक समाप्त करना स्पष्ट रूप से मनमाना है और संवैधानिक समानता के सिद्धांतों के विरुद्ध है।


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