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हाई कोर्ट ने कहा, वसीयत 30 वर्ष से अधिक पुरानी है, उसकी प्रामाणिकता को स्वतः सिद्ध नहीं करता, पढ़िए हाई कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया है

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बिलासपुर। वसीयत की वैधता को लेकर जस्टिस बीडी गुरु के सिंगल बेंच ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। सिंगल बेंच ने अपने आदेश में कहा है, वसीयत के मामले में 30 साल पुराने दस्तावेजों के आधार पर दावा नहीं किया जा सकता। वसीयत की वैधता को गवाहों के आधार पर साबित करना अनिवार्य है। जस्टिस गुरु ने निचली अदालतों के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें केवल पुराने होने के आधार पर 1958 की एक पंजीकृत वसीयत को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि वसीयत, दाता की मृत्यु के बाद ही प्रभावी होती है। उसके जीवनकाल में वह कभी भी निरस्त की जा सकती है। ऐसे में केवल यह तथ्य कि वसीयत 30 वर्ष से अधिक पुरानी है, उसकी प्रामाणिकता को स्वतः सिद्ध नहीं करता।

मामला एक पारिवारिक संपत्ति विवाद से जुड़ा है। याचिकाकर्ता रामप्यारे और शिवशंकर ने विवादित जमीन पर मालिकाना हक, कब्जा और स्थायी निषेधाज्ञा की मांग करते हुए मामला दायर किया था। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि उनके दादा महादेव ने 12 अगस्त, 1958 को एक पंजीकृत वसीयत निष्पादित की थी, जिसके जरिए उन्होंने अपनी कृषि भूमि पिता रामावतार के नाम कर दी थी। याचिका के अनुसार 1988 में महादेव और 1998 में रामावतार की मृत्यु के बाद जमीन के मालिक बन गए। उन्होंने आरोप लगाया कि रामकिशुन (रामावतार के भाई और याचिकाकर्ता के चाचा) ने 2007-08 में जबरन जमीन पर कब्जा कर लिया।

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दूसरी ओर, प्रतिवादी रामकिशुन ने वसीयत की वैधता को चुनौती देते हुए कहा, पिता जगदेव और चाचा महादेव की मृत्यु के बाद पैतृक संपत्ति का रामावतार और उनके बीच आपसी बंटवारा हो चुका था। उन्होंने दावा किया कि महादेव का रामावतार के प्रति कोई विशेष स्नेह नहीं था और अदालत में उसके द्वारा पेश की गई वसीयत फर्जी है। मामले की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया था। ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए रामप्यारे और शिवशंकर ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की। याचिका की सुनवाई करते हुए जस्टिस बीडी गुरु ने कहा, भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 90 के तहत 30 वर्ष से अधिक पुराने दस्तावेजों को लेकर जो वैधता की धारणा बनाई जाती है, वह वसीयत (विल) के मामलों में लागू नहीं होती। हाई कोर्ट ने कहा कि वसीयत को केवल उसकी प्राचीनता के आधार पर सही नहीं माना जा सकता, बल्कि उसका निष्पादन और सत्यापन विधि में निर्धारित कठोर प्रावधानों के अनुसार सिद्ध किया जाना अनिवार्य है।

वसीयत को लेकर हाई कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

जस्टिस गुरु ने अपने फैसले में कहा है, वाद भूमि पर अधिकार का मुख्य आधार वर्ष 1958 की वसीयत बताया गया, लेकिन वसीयत को ना तो भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 63 के अनुसार और ना ही साक्ष्य अधिनियम की धाराओं 68 और 69 के अनुरूप सिद्ध किया गया। कोर्ट ने कहा, वसीयत को प्रमाणित करने के लिए गवाहों के माध्यम से उसका विधिवत प्रमाण आवश्यक है। इस टिप्पणी के साथ ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की याचिका को खारिज कर दिया है।

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