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Supreme Court News: 27% OBC आरक्षण पर हाई कोर्ट तीन महीने में दे फैसला

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Supreme Court News: नई दिल्ली। मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम निर्देश जारी किया है। शीर्ष अदालत ने याचिकाओं के बैच को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट को वापस भेजते हुए तीन महीने के भीतर निर्णय सुनाने को कहा है।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने कहा कि इस मुद्दे पर राज्य की सामाजिक परिस्थितियों और कानूनी पहलुओं का समग्र परीक्षण करने के लिए हाई कोर्ट अधिक उपयुक्त मंच है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बिना हाई कोर्ट के अंतिम फैसले के, अनुच्छेद 32 के तहत सीधे हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा।

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क्या है विवाद?

मध्य प्रदेश सरकार ने वर्ष 2019 में अध्यादेश जारी कर शासकीय सेवाओं में OBC आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत कर दिया था। राज्य में अनुसूचित जाति को 16 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति को 20 प्रतिशत आरक्षण पहले से लागू है। यदि OBC को 27 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाता है, तो कुल आरक्षण 50 प्रतिशत की संवैधानिक सीमा से अधिक हो जाता है। 10 प्रतिशत EWS कोटा जोड़ने पर यह आंकड़ा 73 प्रतिशत तक पहुंचता है। इस संशोधन को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई, जहां अंतरिम आदेश जारी कर 14 प्रतिशत से अधिक OBC आरक्षण पर रोक लगा दी गई।

हाई कोर्ट में विशेष पीठ गठित करने का निर्देश

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सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया कि इस मामले की सुनवाई के लिए विशेष पीठ गठित की जाए और तीन माह के भीतर अंतिम निर्णय दिया जाए। अदालत ने कहा कि आरक्षण और सकारात्मक कार्रवाई (Affirmative Action) से जुड़े प्रश्न प्रत्येक राज्य की सामाजिक संरचना के अनुसार अलग हो सकते हैं, इसलिए राज्य विशेष की परिस्थितियों का मूल्यांकन आवश्यक है।

छत्तीसगढ़ का भी जिक्र

सुनवाई के दौरान छत्तीसगढ़ की आरक्षण व्यवस्था का भी उल्लेख किया गया। राज्य पुनर्गठन अधिनियम 2000 के बाद दोनों राज्यों में आरक्षण की व्यवस्था 1994 के अधिनियम के तहत जारी रही। छत्तीसगढ़ में 2011 के संशोधन के माध्यम से आरक्षण बढ़ाकर 58 प्रतिशत किया गया था, जिसे बिलासपुर हाई कोर्ट ने 2022 में निरस्त कर दिया था। हालांकि, 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी।

राज्य सरकार की दलील खारिज

मध्य प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह भर्ती प्रक्रिया में दो अलग-अलग सूची तैयार कर रही है, ताकि यदि बढ़ा हुआ आरक्षण रद्द हो जाए तो प्रशासनिक दिक्कत न हो। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में अंतिम निर्णय का अधिकार पहले हाई कोर्ट को है। अदालत ने यह भी कहा कि किसी अन्य राज्य की स्थिति को “एकमात्र मार्गदर्शक सिद्धांत” नहीं माना जा सकता।


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