दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम संवैधानिक मामले में साफ कर दिया है कि संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 के तहत लंबित विधेयकों पर राष्ट्रपति या राज्यपाल कब तक फैसला लें, इसकी कोई समय सीमा अदालत तय नहीं कर सकती। अदालत ने कहा कि अगर देरी होती भी है, तो न्यायालय यह नहीं मान सकता कि बिल अपने आप मंजूर हो गया है। बिलों को “मानी गई सहमति” मान लेने का विचार संविधान की मूल भावना और शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत के विपरीत है।
यह संदर्भ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट को भेजा था। लंबी सुनवाई के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश सुरक्षित रख लिया था और अब विस्तृत फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि न्यायपालिका, कार्यपालिका के इस क्षेत्र में सीमित ही हस्तक्षेप कर सकती है।
दिल्ली स्थित सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय संविधान पीठ मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर ने लगभग दस दिन सुनवाई करने के बाद 11 सितंबर को फैसला सुरक्षित रखा था। यह रेफरेंस तमिलनाडु से जुड़े उस विवाद के बाद आया था, जिसमें मद्रास हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए बिलों पर कार्रवाई करने की समय सीमा जैसी दिशा तय की थी। उसी के बाद कई संवैधानिक सवाल राष्ट्रपति की ओर से सुप्रीम कोर्ट के सामने रखे गए थे।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी राज्यपाल की तरफ से बिना वजह, लम्बे समय तक कोई निर्णय ही न लिया जाए और इससे विधायी प्रक्रिया ठप हो जाए, तो ऐसे मामले में कोर्ट सीमित न्यायिक समीक्षा का इस्तेमाल कर सकता है। लेकिन यह समीक्षा केवल इतना कहने तक सीमित होगी कि राज्यपाल एक निश्चित समय के भीतर निर्णय दें, न कि बिल को स्वचालित रूप से पारित घोषित करने तक।
राज्यपाल के संवैधानिक विकल्प क्या हैं?
सुप्रीम कोर्ट से पहला बड़ा सवाल यह था कि जब किसी राज्य के राज्यपाल के समक्ष अनुच्छेद 200 के तहत कोई विधेयक रखा जाता है, तो उनके पास कौन-कौन से संवैधानिक विकल्प उपलब्ध होते हैं।
कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल तीन काम कर सकते हैं:
1. बिल को अपनी स्वीकृति देना।
2. स्वीकृति न देना (यानी अस्वीकार करना) और साथ ही पहले प्रावधान के अनुसार उसे विधानसभा के पास पुनर्विचार के लिए लौटाना।
3. बिल को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रख देना।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पहली प्रोविजो (जो बिल को विधानसभा में वापस भेजने की बात करता है) कोई अलग चौथा विकल्प नहीं है, बल्कि “स्वीकृति न देने” वाले विकल्प को ही सीमित और संरचित करता है। यानी अगर राज्यपाल बिल पर सहमति नहीं देते, तो उसे अनिवार्य रूप से विधानसभा को वापस भेजना होगा। केवल अपने पास रखकर अनिश्चितकाल तक रोक देना संविधान की संघीय संरचना को कमजोर करेगा। इसलिए केंद्र की यह दलील अस्वीकार कर दी गई कि राज्यपाल बिना वापस भेजे, बिल को अपने पास रोक कर रख सकते हैं।
क्या राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधे हैं?
दूसरा सवाल यह था कि क्या अनुच्छेद 200 के तहत उपलब्ध सभी विकल्पों का प्रयोग करते समय राज्यपाल हमेशा मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधे हैं।
अदालत ने कहा कि सामान्यतः राज्यपाल, अनुच्छेद 163 के तहत, मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही काम करते हैं। लेकिन अनुच्छेद 200 के दूसरे प्रावधान में प्रयुक्त शब्द “उनकी राय में” यह दर्शाते हैं कि कुछ सीमित दायरे में वहां उन्हें संवैधानिक विवेक भी दिया गया है। यानी बिल को वापस भेजने या राष्ट्रपति के लिए सुरक्षित रखने के मामले में राज्यपाल सिर्फ औपचारिक मोहर नहीं हैं, बल्कि उन्हें यह देखने का अधिकार है कि मामला संविधान के अनुरूप है या नहीं।
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फिर भी अदालत ने यह साफ किया कि इस विवेक की न्यायिक समीक्षा बिल की सामग्री के आधार पर नहीं की जा सकती। कोर्ट यह नहीं जांच सकता कि गवर्नर ने जो राय बनाई, वह सही थी या गलत। अदालत केवल यह देख सकती है कि कहीं राज्यपाल ने जानबूझकर कोई फैसला ही न लेकर प्रक्रिया को रोके रखा है या नहीं।
गवर्नर के फैसलों पर न्यायिक समीक्षा की सीमा
एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी था कि क्या अनुच्छेद 361, जो राष्ट्रपति और राज्यपाल को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने या उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई से संरक्षण देता है, अनुच्छेद 200 के तहत उनके फैसलों को पूरी तरह न्यायिक समीक्षा से बाहर कर देता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 361 व्यक्ति रूप में राष्ट्रपति और राज्यपाल को इम्युनिटी देता है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि उनके पद से जुड़े सारे निर्णय न्यायालय की पहुंच से बाहर हो जाते हैं। गवर्नर को अदालत में पार्टी बनाकर व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं की जा सकती, लेकिन गवर्नर कार्यालय के फैसले पर सीमित संवैधानिक समीक्षा संभव है, खासकर तब जब किसी विधेयक पर अनावश्यक और अनुचित देरी केली जा रही हो।
कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में न्यायिक दखल का उद्देश्य गवर्नर को मजबूर करना नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रक्रिया को गतिमान रखना होगा। अदालत केवल यह निर्देश दे सकती है कि तय समय के भीतर कोई निर्णय लिया जाए, लेकिन यह नहीं कह सकती कि मंजूरी देना ही होगा या अस्वीकृति ही देनी होगी।
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राष्ट्रपति, डीम्ड असेंट और अनुच्छेद 201 पर सुप्रीम कोर्ट की राय
रेफरेंस में एक अहम सवाल यह था कि क्या अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति द्वारा बिल पर निर्णय लेने के लिए अदालत कोई समय सीमा तय कर सकती है, या यदि लंबी देरी हो तो बिल को “मानी गई मंजूरी” के तौर पर देख सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संविधान ने न तो अनुच्छेद 200 में और न अनुच्छेद 201 में कोई समयसीमा लिखी है। ऐसी स्थिति में न्यायालय अपने आदेश से नई समयसीमा गढ़कर राष्ट्रपति या राज्यपाल के संवैधानिक अधिकारों पर अंकुश नहीं लगा सकता।
“डीम्ड असेंट” यानी मान ली गई मंजूरी की अवधारणा, अदालत के अनुसार, मूलतः यह मानने के बराबर होगी कि अदालत स्वयं गवर्नर या राष्ट्रपति की भूमिका निभा रही है। यह न केवल शक्तियों के पृथक्करण के मूल सिद्धांत के खिलाफ होगा, बल्कि संविधान निर्माता जिस प्रकार की लचीलापन और संवाद की गुंजाइश इन प्रावधानों में रखना चाहते थे, उसे भी समाप्त कर देगा।
कोर्ट ने साफ कहा कि अनुच्छेद 142, जो सुप्रीम कोर्ट को व्यापक न्याय करने की शक्ति देता है, उसके तहत भी अदालत बिलों की “मानी गई मंजूरी” जैसा सिद्धांत लागू नहीं कर सकती। यह प्रावधान न्यायिक निर्णय के क्रियान्वयन के लिए है, न कि नई संवैधानिक व्यवस्था गढ़ने के लिए।
राष्ट्रपति की तरफ से रेफरेंस के माध्यम से सलाह लेने के अधिकार पर अदालत ने कहा कि हर बार जब कोई गवर्नर बिल को राष्ट्रपति के लिए सुरक्षित रखे, तो राष्ट्रपति के लिए सुप्रीम कोर्ट से राय लेना अनिवार्य नहीं है। राष्ट्रपति केवल ऐसे मामलों में रेफरेंस भेज सकते हैं, जहां उन्हें लगे कि संवैधानिक स्थिति अत्यंत जटिल है और सर्वोच्च न्यायालय की राय आवश्यक है।
अंत में सुप्रीम कोर्ट ने दो बातों को बिल्कुल स्पष्ट कर दिया:
- किसी भी राज्य विधानसभा द्वारा पारित विधेयक के कानून बनने के लिए अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल की विधिवत स्वीकृति अनिवार्य है। बिना स्वीकृति के कोई बिल लागू कानून नहीं बन सकता।
- राष्ट्रपति और राज्यपाल के बिलों पर निर्णय, तब तक न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आते जब तक वह बिल कानून न बन जाए। बिल के प्रावधानों को चुनौती केवल तब दी जा सकती है, जब वह विधेयक अधिनियम का रूप लेकर लागू हो चुका हो।








