ज्यूडिशियल अफसर का आदेश बेईमानी या अन्यान्य कारणों से पारित किया गया है तो अनुशासनात्मक कार्रवाई से इंकार क्यों किया जाना चाहिए।
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दिल्ली। मध्य प्रदेश के एक ज्यूडिशियल अफसर की निलंबन को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा सवाल खड़ा किया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ज्यूडिशियल अफसरों के खिलाफ उनके न्यायिक आदेशों के आधार पर कार्रवाई नहीं की जा सकती, लेकिन यदि यह पाया जाता है कि ज्यूडिशियल अफसर का कोई आदेश बेईमानी या अन्यान्य कारणों से पारित किया गया है तो अनुशासनात्मक कार्रवाई से इंकार क्यों किया जाना चाहिए।

मध्यप्रदेश के जिला जज ने अपने निलंबन को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका की सुनवाई सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जाॅयमाल्या बागची व जस्टिस विपुल पंचाेली की बेंच में हुई। निलंबित जिला जज की ओर से सीनियर एडवोकेट विपिन सांघी ने पैरवी की। याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए सीनियर एडवोकेट ने कहा कि याचिकाकर्ता जिला जज एक प्रतिष्ठित और ईमानदार न्यायिक अधिकारी रहे हैं। उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट ACR उत्कृष्ट रही है। याचिकाकर्ता को सेवानिवृत्ति से कुछ दिन पहले निलंबित कर दिया गया। याचिकाकर्ता को जारी निलंबन आदेश में कोई कारण नहीं दर्शाया गया है। सीनियर एडवोकेट ने बताया कि मीडिया रिपोर्टों से यह संकेत मिल रहा है कि याचिकाकर्ता जज के खिलाफ कार्रवाई दो न्यायिक आदेशों के आधार पर की गई।

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उन्होंने कहा कि किसी न्यायिक आदेश के लिए जज के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा सकती, क्योंकि यदि कोई आदेश गलत है तो उसका सुधार अपीलीय मंच पर किया जा सकता है। इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल आदेश के गलत होने के आधार पर अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए लेकिन यदि आदेश स्पष्ट रूप से किसी बेईमान या बाहरी विचार से प्रभावित हो तो ऐसे में कार्रवाई क्यों नहीं की जा सकती। उन्होंने यह भी कहा कि हाल के वर्षों में यह एक चिंताजनक प्रवृत्ति बनती जा रही है कि सेवानिवृत्ति के निकट कुछ जज अत्यधिक प्रभाव वाले आदेश पारित करने लगते हैं। याचिकाकर्ता की ओर से पेश की जा रही दलीलों के बीच बेंच ने पूछा कि जिन आदेशों के कारण याचिकाकर्ता को निलंबित किया गया है उसकी प्रकृति क्या है। किस प्रकृित के आदेशों के कारण हाई कोर्ट को यह फैसला लेना पड़ा। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि खनन गतिविधियों से जुड़ी रॉयल्टी और पेनल्टी की वसूली पर रोक से संबंधित थे। कोर्ट ने पूछा कि क्या इस तरह के आदेशों से करोड़ों रुपये की वसूली प्रभावित हो रही थी।

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अधिवक्ता ने कहा कि आदेशों का विस्तृत अध्ययन उन्होंने नहीं किया है, लेकिन ऐसी कोई सामग्री या दस्तोवज रिकॉर्ड में नहीं है जिससे यह साबित हो, याचिकाकर्ता जज का फैसला किसी बाहरी कारण से प्रेरित रहा हो। कोर्ट ने सीनियर एडवोकेट से पूछा कि क्या ऐसे मामलों में राजस्व विभाग को नोटिस जारी किया गया था। अधिवक्ता ने बताया कि राज्य सरकार को सुनवाई का अवसर देने के बाद ही इस तरह का अंतरिम आदेश जारी किए गए थे। याचिका की सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आया कि याचिकाकर्ता जज 30 नवंबर, 2025 को रिटायर होने वाले थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के 20 नवंबर के आदेश से मध्य प्रदेश के जजों की सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाए जाने के कारण उनका कार्यकाल 30 नवंबर 2026 तक बढ़ गया था। हालांकि उनका निलंबन आदेश 19 नवंबर को पारित किया गया।


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