Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, सरकारी कर्मचारी को बिना विभागीय जांच के सेवा से बर्खास्त नहीं किया जा सकता। बर्खास्तगी से पहले विभागीय जांच का आदेश जारी करना और संबंधित कर्मचारी को अपना पक्ष का पर्याप्त अवसर देना होगा।

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दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा है, सरकारी कर्मचारी को बिना विभागीय जांच के सेवा से बर्खास्त नहीं किया जा सकता। बर्खास्तगी से पहले विभागीय जांच का आदेश जारी करना और संबंधित कर्मचारी को अपना पक्ष का पर्याप्त अवसर देना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है, जांच को टालने का निर्णय केवल अनुमान या आशंका के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस सामग्री के आधार पर होना चाहिए।

जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की डिवीजन बेंच में दिल्ली पुलिस के एक कांस्टेबल की याचिका पर सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता ने बर्खास्तगी आदेश को चुनौती देते हुए दायर याचिका में बताया है, बिना विभागीय जांच कराए उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस DCP ने यह कहते हुए उसे बर्खास्त कर दिया, उसके खिलाफ आपराधिक मामला लंबित है और विभागीय जांच होने पर वह गवाहों को धमका सकता है या प्रभावित कर सकता है।

पढ़िए सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा?

मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए कांस्टेबल की सेवा बहाली का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 311(2) के तहत सामान्य नियम है, किसी सरकारी कर्मचारी को बर्खास्त करने से पहले विभागीय जांच की जाए और उसे आरोपों का जवाब देने का उचित अवसर दिया जाए। हालांकि अनुच्छेद 311(2) के दूसरे प्रावधान की धारा (b) के तहत, यदि सक्षम प्राधिकारी लिखित रूप में यह संतुष्ट हो जाए कि जांच करना “व्यावहारिक रूप से संभव नहीं” है, तभी बिना जांच के बर्खास्त किया जा सकता है।

अनुमान के आधार पर जांच को दरकिनार करना कानून स्वीकार्य नहीं

सुप्रीम कोर्ट के डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है, डीसीपी की रिपोर्ट में ऐसा कोई ठोस उदाहरण नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी ने गवाहों को धमकाया या प्रभावित किया। जब बर्खास्तगी का आदेश पारित किया गया, उस समय कांस्टेबल जेल में था और उसके खिलाफ गवाहों को धमकाने का कोई प्रमाण रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा, केवल अनुमान के आधार पर जांच को दरकिनार करना कानूनन स्वीकार्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, विभागीय जांच को टालने का फैसला किसी अधिकारी के कथन मात्र पर आधारित नहीं हो सकता।

पढ़िए क्या है मामला?

याचिकाकर्ता दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल में कांस्टेबल के रूप में कार्यरत था। उसके खिलाफ पुलिस ने डकैती और आपराधिक साजिश जैसे अपराधों में संलिप्तता का आरोप लगाते हुउ एफआईआर दर्ज कर उसे गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के दौरान ही डीसीपी ने अनुच्छेद 311(2)(b) का हवाला देते हुए उसे बिना विभागीय जांच के सेवा से बर्खास्त कर दिया। डीसीपी के आदेश को कांस्टेबल ने पहले केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण CAT में चुनौती दी थी, कैट ने उसकी याचिका खारिज कर दी गई। कैट के फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई के बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने कांस्टेबल की याचिका को खारिज करते हुए कैट के फैसले को सही ठहराया था। दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए कांस्टेबल ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

मामले की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता कांस्टेबल को सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा,उसे सेवा की निरंतरा मिलेगी। याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक प्रकरण लंबित है, लिहाजा कोर्ट ने बर्खास्तगी की तिथि से पुनर्नियुक्ति तक की अवधि के लिए 50% बैक वेज देने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कांस्टेबल की बहाली से पुलिस विभाग को यह अधिकार बना रहेगा कि वह कानून के अनुसार उसके खिलाफ नियमित विभागीय जांच शुरू कर सके।


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