बिलासपुर। शिक्षाकर्मी से शिक्षक एलबी के रूप में संविलियन के बाद सेवा गणना और वरिष्ठता को लेकर चला आ रहा विवाद एक बार फिर हाई कोर्ट के समक्ष आया। छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों में पदस्थ 300 से अधिक शिक्षक एलबी ने अपनी पेंशन पात्रता और सेवा गणना को स्पष्ट किए जाने की मांग करते हुए हाई कोर्ट में याचिकाएं दायर की थीं। इन सभी याचिकाओं पर जस्टिस एके प्रसाद के सिंगल बेंच में एकसाथ सुनवाई हुई।
याचिकाकर्ता शिक्षकों का कहना था कि वे वर्ष 1998–99 से शिक्षाकर्मी के रूप में निरंतर सेवाएं दे रहे हैं। राज्य सरकार द्वारा पुरानी पेंशन योजना बहाल कर दी गई है, लेकिन यह अब तक स्पष्ट नहीं किया गया है कि शिक्षक एलबी के मामले में पेंशन के लिए सेवा की गणना किस तिथि से की जाएगी—प्रारंभिक नियुक्ति से, नियमितीकरण से या फिर 1 जुलाई 2018 से हुए संविलियन की तिथि से। इसी अस्पष्टता के कारण हजारों शिक्षकों की पेंशन और वरिष्ठता से जुड़े मामले लंबित हैं। सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से पैरवी कर रहे महाधिवक्ता कार्यालय के विधि अधिकारियों ने कोर्ट को बताया कि पूर्व में शिक्षाकर्मियों की नियुक्ति पंचायत विभाग के माध्यम से हुई थी। पंचायत विभाग और स्कूल शिक्षा विभाग की सेवाएं अलग-अलग संवर्ग की हैं, इसलिए पंचायत संवर्ग की सेवाओं को स्वतः शिक्षा विभाग की सेवा मानकर पेंशन का लाभ देना संभव नहीं है। राज्य सरकार ने यही तर्क कोर्ट के समक्ष रखा।
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इस पर हाई कोर्ट ने अपने आदेश में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि जब किसी कर्मचारी की सेवा एक से अधिक चरणों में रही हो जैसे अस्थायी शिक्षाकर्मी से नियमित शिक्षक एलबी के रूप में तो पेंशन की पात्रता तब तक तय नहीं की जा सकती, जब तक राज्य सरकार इस विषय पर एक स्पष्ट, अंतिम और सभी पर समान रूप से लागू होने वाली नीति नहीं बनाती। कोर्ट ने कहा कि ऐसी नीति में यह साफ तौर पर बताया जाना चाहिए कि पेंशन के लिए “नियुक्ति की निर्णायक तिथि” कौन-सी मानी जाएगी। जस्टिस एके प्रसाद ने यह भी स्पष्ट किया कि नीति बनाना कार्यपालिका का अधिकार क्षेत्र है, न कि न्यायालय का। हालांकि, सरकार द्वारा बनाई जाने वाली कोई भी नीति तर्कसंगत, स्पष्ट और मनमानेपन से मुक्त होनी चाहिए। नीति ऐसी होनी चाहिए जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता और न्याय के सिद्धांतों पर खरी उतरे, ताकि किसी वर्ग के साथ भेदभाव न हो।
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गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में वर्तमान में लगभग 1.60 लाख शिक्षक एलबी कार्यरत हैं। राज्य सरकार ने शिक्षाकर्मियों के संविलियन की प्रक्रिया 1 जुलाई 2018 से शुरू की थी। शुरुआत में आठ वर्ष की सेवा पूर्ण करने वाले शिक्षाकर्मियों का संविलियन किया गया, बाद में यह अवधि घटाकर दो वर्ष कर दी गई। इस फैसले के बाद बड़ी संख्या में शिक्षाकर्मी शिक्षक एलबी के रूप में स्कूल शिक्षा विभाग में संविलियन हुए, लेकिन तभी से सेवा गणना, वरिष्ठता और पेंशन को लेकर विवाद बना हुआ है। हाई कोर्ट के इस आदेश के बाद अब गेंद राज्य सरकार के पाले में है। शिक्षकों को उम्मीद है कि सरकार जल्द ही एक स्पष्ट और समान नीति बनाकर इस लंबे समय से चले आ रहे विवाद का समाधान करेगी।








