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पेंशन के लिए घूसखोरी, दर्ज FIR नहीं होगी रद्द

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बिलासपुर। याचिकाकर्ता सरकारी क्लर्क ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर काे रद्द करने की मांग करते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में बताया कि पूरे विवाद का पटाक्षेप हो गया है और समझौता भी करा लिया गया है। डिवीजन बेंच ने साफ कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ अवैध धन की मांग और गबन का आरोप है। यह समाज के लिए गंभीर है और यह केवल निजी मामला नहीं है। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया है। मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस बीडी गुरु की डिवीजन बेंच में हुई। डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में लिखा है कि CrPC की धारा 482 के तहत FIR को रद्द करने की शक्ति केवल असाधारण परिस्थितियों में ही प्रयोग की जानी चाहिए। बेंच ने लिखा है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ अवैध धन की मांग और गबन के आरोप समाज के लिए गंभीर हैं और यह केवल निजी मामला नहीं है।

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ब्लैंक चेक से निकाला दो लाख 80 हजार रुपये
मृतक शिक्षक की विधवा ने पति की मृत्यु के बाद पेंशन का निर्धारण सहित अन्य देयकों के भुगतान के लिए विभाग के समक्ष आवेदन पेश किया। पेंशन सहित अन्य प्रकरणों की फाइल जल्दी आगे सरकाने के लिए विभाग के क्लर्क ने दो लाख रुपये की घूस मांगी। इस पर शिक्षक की पत्नी ने क्लर्क को ब्लैेंक चेक दे दिया। कुछ दिनों बाद शिक्षक की पत्नी को पता चला कि उसके बैंक अकाउंट से दो लाख 80 हजार रुपये निकाल लिए गए हैं। बैंक में जब पता की तब बताया कि उसी के द्वारा जारी चेक के माध्यम से राशि निकाली गई है। तब उसने क्लर्क के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में उसने क्लर्क द्वारा रिश्वत मांगने पर ब्लैंक चेक देने की जानकारी दी। यह भी बताया कि उसके खाते से बिना बताए राशि निकाल ली है। पति के पेंशन सहित अन्य देयकों की फाइल अब भी लंबित है। शिकायत की जांच के बाद पुलिस ने 20 जून, 2025 संबंधित क्लर्क और सहयोगी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर कार्रवाई प्रारंभ की। क्लर्क ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर बताया कि विवाद का निपटारा हो गया है। शिकायतकर्ता एफआईआर रद्द करने में अपनी सहमति भी दे दी है। यह सब बताने के साथ ही पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की।

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ला अफसरों ने कहा, नहीं रद्द की जा सकती FIR
डिवीजन बेंच के समक्ष राज्य सरकार की ओर से पैरवी करते हुए महाधिवक्ता कार्यालय के ला अफसरों ने याचिकाकर्ता की मांग का विरोध करते हुए कहा, एक बार FIR दर्ज होने के बाद उसका पूरी तरह से जांच होना जरूरी है। ला अफसरों ने यह भी बताया कि केवल समझौते के आधार पर FIR रद्द नहीं किया जा सकता। खासकर जब आरोप चारसौबीसी जैसे गैर-सुलझने योग्य अपराधों से जुड़े हों। विधि अधिकारियों का पक्ष सुनने के बाद हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में लिखा है, CrPC की धारा 482 के तहत FIR को रद्द करने की शक्ति केवल असाधारण परिस्थितियों में ही प्रयोग की जानी चाहिए। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ अवैध धन की मांग और गबन के आरोप समाज के लिए गंभीर हैं और यह केवल निजी मामला नहीं है। डिवीजन बेंच ने कहा, पक्षकारों के बीच कोई लिखित समझौता नहीं हुआ और FIR रद्द करने का कोई औचित्य नहीं है। इस टिप्पणी के साथ डिवीजन बेंच ने याचिका को खारिज कर दिया है।

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