बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में इस बार धान खरीदी की शुरुआत को लेकर गहरी अनिश्चितता बन गई है। सरकारी खरीदी केंद्रों में धान खरीदने की तैयारी लगभग पूरी हो चुकी थी, लेकिन समिति प्रबंधक, कंप्यूटर ऑपरेटर, लेखापाल, चौकीदार और अन्य कर्मचारियों के हड़ताल पर चले जाने से पूरा सिस्टम रुक गया है। करीब 15 हजार कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर आंदोलन पर डटे हुए हैं और साफ चेतावनी दी है कि जब तक सरकार ठोस आश्वासन नहीं देती, वे काम पर नहीं लौटेंगे।
इस स्थिति ने अफसरों की नींद उड़ा दी है। राज्य सरकार ने अब वैकल्पिक व्यवस्था बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सभी जिलों के कमिश्नरों और कलेक्टरों को निर्देश दिया गया है कि अन्य विभागों के ऐसे कर्मचारियों की पहचान करें, जो अस्थायी रूप से धान खरीदी केंद्रों का काम संभाल सकें।
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सरकार ने बनाई नई योजना, दूसरे विभागों के कर्मचारी करेंगे खरीदी
सरकार ने निर्णय लिया है कि जब तक समिति के कर्मचारी हड़ताल पर हैं, तब तक दूसरे विभागों के अधिकारी और कर्मचारी धान खरीदी की जिम्मेदारी संभालेंगे। इसके लिए आज ही एक दिन की त्वरित ट्रेनिंग दी जाएगी, जिसके बाद ये कर्मचारी सीधे खरीदी केंद्रों पर जाकर किसानों से धान खरीदना शुरू करेंगे। लेकिन यहां बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या सिर्फ एक दिन की ट्रेनिंग में इतने तकनीकी काम को सही ढंग से सीखा जा सकता है? क्योंकि खरीदी प्रक्रिया में धान की नमी, वजन और गुणवत्ता को लेकर अक्सर विवाद खड़े होते हैं, और थोड़ी सी गलती भारी नुकसान का कारण बन सकती है।
नमी वाला धान बना सिरदर्द , नुकसान किसे उठाना पड़ेगा?
खरीदी केंद्रों पर अक्सर नमी को लेकर टकराव देखने को मिलता है। यदि ये अस्थायी कर्मचारी गलती से अधिक नमी वाला धान खरीद लेते हैं और 72 घंटे के भीतर उसका उठाव नहीं होता, तो धान सूखने पर उसका वजन कम हो जाएगा। आमतौर पर ऐसे मामलों में समिति प्रबंधकों पर फर्जीवाड़े का आरोप लगता है, अब सवाल है कि इस बार जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
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गड़बड़ी हुई तो जवाबदेही कौन लेगा?
अगर आने वाले दिनों में हड़ताल लंबी चली और अलग-अलग विभागों के कर्मचारी खरीदी केंद्रों पर काम संभालते रहे तो गड़बड़ी की स्थिति में जिम्मेदारी तय करना मुश्किल होगा। मान लीजिए, हफ्ते भर बाद कर्मचारी संघ और सरकार के बीच समझौता हो भी गया, तब तक खरीदी प्रक्रिया में हुई त्रुटियों का जवाब कौन देगा? सरकार इस चिंता को लेकर अब जवाबदेही तय करने के विकल्पों पर भी विचार कर रही है।
धान के सूखत पर सबसे बड़ा विवाद
राज्य सरकार ने आदेश दिया है कि 17 प्रतिशत नमी वाला धान ही खरीदा जाएगा, और खरीदी के 72 घंटे के भीतर उसका उठाव संग्रहण केंद्रों तक पहुंचाया जाना चाहिए। इसके लिए मार्कफेड और खाद्य विभाग की जिम्मेदारी तय है, लेकिन पिछले वर्षों में यह देखा गया कि धान महीनों तक केंद्रों पर पड़ा रहता है, जिससे नमी सूखने से वजन घटता है। इसका नुकसान समिति प्रबंधकों को झेलना पड़ता है, और अक्सर उन पर फर्जी खरीदी के आरोप भी लगते हैं।
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कैबिनेट बैठक से उम्मीदें, क्या सुलझेगा विवाद?
इस बीच, कल मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की अध्यक्षता में कैबिनेट बैठक होने वाली है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इस बैठक में हड़ताल और खरीदी व्यवस्था को लेकर अहम चर्चा हो सकती है। संभावना जताई जा रही है कि सरकार कोई ठोस फैसला लेकर विवाद खत्म करने की दिशा में कदम बढ़ा सकती है, ताकि धान खरीदी सुचारु रूप से शुरू हो सके।
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किसानों में चिंता, प्रशासन सतर्क
लगातार बढ़ती देरी से किसानों में बेचैनी देखी जा रही है। वे चाहते हैं कि जल्द से जल्द खरीदी शुरू हो, ताकि धान घरों और खेतों में खराब न हो। वहीं, प्रशासन पूरी स्थिति पर नजर बनाए हुए है और दावा कर रहा है कि चाहे जैसे भी हालात हों, धान खरीदी निर्धारित समय पर शुरू की जाएगी।








