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हाई कोर्ट ने पावर ऑफ अटार्नी के कानूनी अधिकार को लेकर दिया महत्वपूर्ण फैसला

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बिलासपुर। चेक बाउंस मामलों में पावर ऑफ अटार्नी के अधिकार को लेकर हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और स्पष्ट फैसला दिया है। जस्टिस एनके व्यास के सिंगल बेंच ने कहा है कि यदि पावर ऑफ अटार्नी धारक को लेनदेन, समझौते और पूरे घटनाक्रम की समुचित जानकारी है, तो वह वैध रूप से शिकायत दर्ज करा सकता है। यह फैसला न्यायिक दृष्टांत (AFR) के रूप में माना जाएगा। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में आरोपी को निर्देश दिया है कि वह आदेश की प्रति प्राप्त होने की तिथि से दो माह के भीतर कुल 8,75,000 रुपये (जिसमें 7,75,000 रुपये चेक राशि शामिल है) के साथ-साथ निचली अदालत द्वारा तय मुआवजे की राशि का भुगतान करे। यदि तय समय-सीमा में भुगतान नहीं किया जाता है, तो आरोपी को एक माह का कारावास भुगतना होगा।

यह मामला रायगढ़ के 5वें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के आदेश से जुड़ा है, जिसमें न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, रायगढ़ द्वारा पारित निर्णय को रद्द करते हुए आरोपी देवानंद पटेल को नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के आरोप से बरी कर दिया गया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए रायगढ़ की महालक्ष्मी ट्रैक्टर्स की संचालिका मोनालिसा अग्रवाल ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।

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क्या है पूरा मामला

याचिकाकर्ता मोनालिसा अग्रवाल अपने पावर ऑफ अटार्नी धारक बृजमोहन अग्रवाल के माध्यम से महालक्ष्मी ट्रैक्टर्स का संचालन करती हैं। आरोप है कि देवानंद पटेल ने 22 मई 2008 को 5,95,000 रुपये मूल्य का ट्रैक्टर और उससे जुड़े उपकरण उधार पर खरीदे थे। दोनों पक्षों के बीच यह सहमति बनी थी कि उधार बिक्री पर 3 प्रतिशत मासिक ब्याज का भुगतान किया जाएगा। इसके बाद देवानंद पटेल ने कर्नाटक बैंक, रायगढ़ शाखा का 10,40,000 रुपये का चेक दिया, जो बाउंस हो गया। बाद में ट्रैक्टर के उपयोग के एवज में किराया तय हुआ और उस संबंध में भी दिए गए चेक बाउंस हो गए। अंततः 18 जुलाई 2011 को दोनों पक्षों के बीच एक पंजीकृत समझौता हुआ, जिसके तहत आरोपी ने 7,75,000 रुपये का चेक दिया। यह चेक भी निर्धारित समय में भुनाया नहीं जा सका। समय-सीमा समाप्त होने के बाद आरोपी को कानूनी नोटिस भेजा गया, लेकिन भुगतान नहीं किया गया। इसके बाद चेक बाउंस की शिकायत न्यायालय में दर्ज की गई।

हाई कोर्ट का स्पष्ट रुख

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हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि रायगढ़ के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश कानूनन सही नहीं था। कोर्ट ने उस आदेश को रद्द करते हुए न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी के फैसले को बहाल कर दिया। साथ ही आरोपी को दी गई सजा में संशोधन करते हुए मुआवजे की राशि बढ़ाई गई। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पावर ऑफ अटार्नी धारक, यदि पूरे लेनदेन से भली-भांति परिचित है, तो वह शिकायत दर्ज कराने के लिए पूरी तरह सक्षम है।


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