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CGMSC News: विवादों से घिरे CGMSC अफसरों की पोल एक बार फिर हाई कोर्ट के सामने खुली, इस बार टेंडर में किया फर्जीवाड़ा, पढ़िए हाई कोर्ट ने क्या सुनाया है फैसला

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बिलासपुर। CGMSC ने 23 सितंबर 2025 को जशपुर जिले के पत्थलगांव ब्लॉक में 50 बिस्तरों वाले अस्पताल के निर्माण कार्य के लिए ई-निविदा आमंत्रित की थी। इस परियोजना की अनुमानित लागत 400.98 लाख रुपये तय की गई थी। निविदा प्रक्रिया 30 सितंबर से शुरू होकर 23 अक्टूबर 2025 तक चली, जबकि निविदाएं खोलने की तिथि 24 अक्टूबर निर्धारित थी। याचिकाकर्ता दुर्गा मेडिकल, घरघोड़ा (जिला रायगढ़) के नटवर लाल अग्रवाल ने सभी आवश्यक दस्तावेजों और पात्रता प्रमाण पत्रों के साथ 13 अक्टूबर 2025 को अपनी बोली जमा की थी। उन्होंने अनुमानित लागत से 9.9 प्रतिशत कम दर की पेशकश की थी, जो राज्य के लिए सबसे लाभकारी बोली थी।

वित्तीय बोली नहीं खोली गई, ई-मेल से किया बाहर

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याचिकाकर्ता के अनुसार 5 जनवरी 2026 को जब वित्तीय बोलियां खोली गईं, तब पोर्टल पर हितेश सूर्यवंशी को 9.2200 प्रतिशत कम दर के साथ सबसे कम बोलीदाता घोषित कर दिया गया, जबकि याचिकाकर्ता की 9.9 प्रतिशत कम बोली अधिक किफायती थी। हैरानी की बात यह रही कि याचिकाकर्ता की वित्तीय बोली खोली ही नहीं गई। उसी दिन शाम को CGMSC और स्वास्थ्य विभाग की ओर से एक ई-मेल भेजकर यह कहा गया कि स्पष्टीकरण न देने के कारण बोली अयोग्य कर दी गई है। याचिकाकर्ता ने इसे अस्पष्ट और भ्रामक कारण बताया।

समान दस्तावेज, फिर भी अलग-अलग व्यवहार

याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि उसी दिन उसने रायगढ़ जिले में 100 बिस्तरों वाले एमसीएच भवन के स्टाफ क्वार्टर निर्माण की निविदा में भी भाग लिया था, जिसमें वही दस्तावेज और प्रमाण पत्र लगाए गए थे। उस टेंडर में उसकी बोली तकनीकी रूप से सही पाई गई और वित्तीय बोली भी खोली गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि दस्तावेजों में कोई कमी नहीं थी। इसके बावजूद जशपुर अस्पताल के टेंडर में उसे बाहर कर दिया गया और अधिक दर वाले ठेकेदार को काम सौंप दिया गया, जिससे सार्वजनिक धन को नुकसान पहुंचा।

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हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी

डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि भले ही टेंडर मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित हो, लेकिन न्यायालय यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य है कि निर्णय प्रक्रिया मनमानी, पक्षपातपूर्ण या प्रक्रियात्मक त्रुटियों से मुक्त हो। इस मामले में याचिकाकर्ता को जिस तरह से बाहर किया गया, वह समान अवसर और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लंघन है।

जनहित को देखते हुए टेंडर रद्द नहीं

कोर्ट ने यह भी कहा कि चूंकि ठेका पहले ही दिया जा चुका है और कार्य प्रगति पर है, इसलिए इस स्तर पर टेंडर या अनुबंध को रद्द करना व्यापक जनहित में उचित नहीं होगा। ऐसा करने से सार्वजनिक कार्यों में अनावश्यक देरी और जटिलता उत्पन्न हो सकती है।

एक लाख रुपये क्षतिपूर्ति का आदेश

डिवीजन बेंच ने माना कि CGMSC ने याचिकाकर्ता के साथ मनमाना और अनुचित व्यवहार किया है। इसी आधार पर कोर्ट ने निगम को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता को एक लाख रुपये क्षतिपूर्ति के रूप में चार सप्ताह के भीतर भुगतान करे। यदि तय समय सीमा में राशि का भुगतान नहीं किया गया, तो उस पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।


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