CG High Court News: बिलासपुर। बिलासपुर हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने एक महत्वपूर्ण आपराधिक मामले में ट्रायल कोर्ट के निर्णय को निरस्त कर दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की पीठ ने स्पष्ट किया कि संदेहास्पद मृत्युपूर्व बयान (डाइंग डिक्लेरेशन) के आधार पर हत्या की सजा बरकरार नहीं रखी जा सकती। कोर्ट ने कहा कि जब साक्ष्यों में गंभीर संदेह हो, तो उसका लाभ आरोपी को दिया जाना चाहिए। ट्रायल कोर्ट ने पति को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इस आदेश को चुनौती देते हुए आरोपी ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने न केवल सजा रद्द की, बल्कि आरोपी की तत्काल रिहाई का निर्देश भी दिया।
क्या था पूरा मामला
महासमुंद जिले के सावित्रीपुर गांव की निवासी सुनीता बिसरा 31 मार्च 2020 को लगभग 80 प्रतिशत झुलसी अवस्था में मिली थीं। उन्हें पहले पिथौरा अस्पताल ले जाया गया, जहां से गंभीर स्थिति को देखते हुए रायपुर के डीकेएस अस्पताल रेफर किया गया। उपचार के दौरान 3 अप्रैल 2020 को उनकी मृत्यु हो गई। परिजनों ने आरोप लगाया था कि उनके पति राहुल बिसरा ने केरोसिन डालकर आग लगाई। पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया। प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, महासमुंद ने सुनवाई के बाद आरोपी को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी।
हाई कोर्ट ने क्यों किया हस्तक्षेप
अपील की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि मृतका का बयान मजिस्ट्रेट द्वारा नहीं बल्कि चिकित्सक द्वारा लिया गया था। बयान लेने से पहले यह सुनिश्चित नहीं किया गया कि वह मानसिक रूप से बयान देने की स्थिति में थीं या नहीं। साथ ही, कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह भी प्रस्तुत नहीं किया गया। डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि आपराधिक मामलों में आरोप सिद्ध करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष की होती है। यदि साक्ष्यों में संदेह हो, तो आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि मृतका घटना के बाद तीन दिन तक जीवित रहीं और अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि आगजनी ही मृत्यु का एकमात्र कारण थी। इलाज के दौरान अन्य जटिलताओं की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता।
संदेहास्पद मृत्युपूर्व बयान पर्याप्त नहीं
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल विवादित मृत्युपूर्व बयान और बरामदगी के आधार पर हत्या का अपराध सिद्ध करना पर्याप्त नहीं है। न्यायालय ने माना कि जब तक प्रमाण ठोस और संदेह से परे न हों, तब तक कठोर सजा को बनाए रखना न्यायसंगत नहीं है।
आरोपी को मिली राहत
इन टिप्पणियों के साथ हाई कोर्ट ने आरोपी को हत्या के आरोप से बरी कर दिया और ट्रायल कोर्ट का आदेश निरस्त कर दिया। साथ ही, आरोपी को छह महीने के लिए निचली अदालत में मुचलका भरने का निर्देश दिया गया है, ताकि यदि राज्य सरकार इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देती है तो आवश्यकतानुसार उसकी उपस्थिति सुनिश्चित की जा सके।








