रायपुर। छत्तीसगढ़ के ई और टी दोनों ही संवर्गों में इस बार ऐसी स्थिति बनी कि करीब 800 शिक्षकों की वर्षों पुरानी इच्छा अधूरी रह गई। प्राचार्य पद पर पहुंचने का सपना आंखों में लिए वे सेवा समाप्ति के कगार पर खड़े थे, लेकिन ठीक उसी समय विभाग के ही कुछ साथियों द्वारा अदालत का दरवाज़ा खटखटाए जाने से पदोन्नति की पूरी प्रक्रिया थम गई। महीनों तक चले कानूनी विवाद में फैसला आने में इतनी देर हुई कि शिक्षक रिटायर होते गए और प्रिंसिपल बनने का उनका अंतिम मौका हाथ से निकल गया। दुखद यह है कि जिन शिक्षकों ने पूरी जिंदगी सेवा में बिता दी, विभागीय विवाद ने उन्हें उनके हक से दूर कर दिया।
रायपुर में स्कूल शिक्षा विभाग प्राचार्य के पद पर पदोन्नति देने की प्रक्रिया को अंतिम रूप देने की तैयारी कर चुका था। लेकिन नियमों और मापदंडों को लेकर उठे सवालों ने सबकुछ रोक दिया। मामले में याचिकाएं लगती चली गईं और अदालत में छह महीने से अधिक समय तक सुनवाई चलती रही। इसी दौरान दोनों संवर्गों में हर महीने सैकड़ों शिक्षक रिटायर होते गए। जिनकी पदोन्नति सूची में जगह थी, वे भी अदालत के फैसले का इंतज़ार करते-करते अपने कार्यकाल के अंतिम दिन तक पहुंच गए।
अदालत का फैसला आया तो कई की सेवा समाप्ति की तारीख बीत चुकी थी। विभागीय रिकॉर्ड बताते हैं कि ई संवर्ग में 1478 प्राचार्य पदों की प्रक्रिया के दौरान ही 350 से अधिक लेक्चरर और हेड मास्टर रिटायर हो गए। टी संवर्ग में भी हालात इसी तरह रहे। कई ऐसे शिक्षक जिनके पास मात्र कुछ महीनों की सेवा शेष थी, काउंसलिंग में भी शामिल नहीं हुए क्योंकि रिटायरमेंट के इतने करीब स्थानांतरण या नई पोस्टिंग पेंशन संबंधी दस्तावेज़ों को जटिल कर देती है। साथ ही, प्राचार्य और लेक्चरर के वेतनमान में बड़ा अंतर न होने के कारण भी शिक्षकों ने यह जोखिम नहीं उठाया।
इस पूरी प्रक्रिया का दूसरा पहलू यह है कि यदि कानूनी विवाद न खड़ा होता, तो इन शिक्षकों को उनके अनुभव और वरिष्ठता के आधार पर उसी वर्ष प्रिंसिपल की कुर्सी मिल जाती। लेकिन विभाग के ही कुछ शिक्षकों ने नीतियों, नियमों और वरिष्ठता सूची को चुनौती देकर पूरा मामला रोक दिया। धीरे-धीरे महीनों की सुनवाई वर्षों में बदल गई, और शिक्षकों की सेवा का अमूल्य समय निकलता रहा। आज वे सभी लेक्चरर या हेड मास्टर के पद से रिटायर हो चुके हैं, जबकि उनका सपना था कि करियर के अंतिम वर्ष प्राचार्य के रूप में गुजारें।
सुप्रीम कोर्ट का रुख, पदोन्नति पर रोक की मांग खारिज
हाई कोर्ट में मामला लंबा खिंचने के बाद शिक्षक आनंद प्रसाद साहू ने डिवीजन बेंच के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। उन्होंने प्राचार्य पदोन्नति प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग की थी। सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उनके अनुरोध को खारिज कर दिया। जस्टिस जेके माहेश्वर और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने पाया कि पदोन्नति रोकने का कोई ठोस आधार प्रस्तुत नहीं किया गया। इससे यह स्पष्ट हो गया कि अब विभाग प्राचार्य पदों पर आगे की प्रक्रिया जारी रख सकता है।
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विवाद की जड़, नियम 2019, वरिष्ठता और फीडर कैडर का मुद्दा
पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब शिक्षक नारायण प्रकाश तिवारी ने स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा जारी 30 अप्रैल 2025 के पदोन्नति आदेश को चुनौती दी। उनका कहना था कि 2019 के भर्ती नियमों के अनुसार उन्हें वरिष्ठता के आधार पर प्रमुखता मिलनी चाहिए थी, लेकिन उनके कनिष्ठों को पदोन्नति देकर उन्हें वंचित कर दिया गया।
उन्होंने याचिका में विभाग के पुराने नियमों, 2014 और 2008 के कोटे, और 2019 के नए प्रावधानों में उठे विरोधाभासों को सामने रखा। उनका मुख्य तर्क यह था कि फीडर कैडर तथा पदोन्नति की श्रेणियों को लेकर विभाग ने स्पष्टता नहीं रखी। नियम 15 के स्पष्टीकरण को पहले ही न्यायालय अल्ट्रा वायर्स घोषित कर चुका था, परंतु विभाग ने नया स्पष्टीकरण प्रस्तुत किए बिना ही आगे की प्रक्रिया शुरू कर दी। इसी आधार पर तिवारी सहित अन्य शिक्षकों ने पदोन्नति सूची को चुनौती दी थी।
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राज्य शासन की ओर से प्रस्तुत पक्ष में यह कहा गया कि 2019 के नियम पूर्व के सभी नियमों को प्रतिस्थापित करते हैं, और व्याख्याता व हेड मास्टर दोनों ही प्रिंसिपल के फीडर कैडर माने गए हैं। कोटे भी स्पष्ट रूप से निर्धारित हैं, इसलिए पदोन्नति उस आधार पर की गई। मामले में दोनों ओर से दलीलें लंबी चलीं, लेकिन अंतिम परिणाम यह रहा कि विवाद के कारण प्रक्रिया में देरी होती गई और कई शिक्षक समय पर प्रिंसिपल नहीं बन पाए।








