CG NEWS: रायपुर। वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अरुणदेव गौतम पिछले 14 महीनों से छत्तीसगढ़ में कार्यवाहक डीजीपी के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे थे। डीजीपी की नियमित नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ कहा था कि राज्यों में “प्रभारी डीजीपी” की व्यवस्था स्वीकार नहीं की जाएगी और पूर्णकालिक डीजीपी की नियुक्ति जरूरी है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने यूपीएससी से जवाब मांगा था। जवाबी प्रक्रिया के दौरान यूपीएससी ने छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर नियमित डीजीपी की नियुक्ति में हो रही देरी पर स्पष्टीकरण मांगा था।
अब शनिवार को राज्य सरकार ने आदेश जारी कर अरुण देव गौतम को छत्तीसगढ़ का पूर्णकालिक पुलिस महानिदेशक नियुक्त कर दिया है। माना जा रहा है कि इस फैसले की जानकारी यूपीएससी को भी दे दी गई है। ऐसे में अब सुप्रीम कोर्ट में चल रही प्रक्रिया के दौरान यूपीएससी राज्य में नियमित डीजीपी नियुक्ति को लेकर अपना जवाब पेश कर सकेगा।
UPSC ने मुख्य सचिव से पूछा था देरी का कारण
छत्तीसगढ़ में स्थायी डीजीपी की नियुक्ति नहीं होने पर संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) ने मुख्य सचिव विकासशील को सख्त पत्र भेजा था। आयोग ने पूछा था कि अब तक राज्य में नियमित पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति क्यों नहीं की गई है।
UPSC के अवर सचिव दीपक शॉ द्वारा जारी पत्र में कहा गया था कि राज्य सरकार ने अब तक नियमित डीजीपी नियुक्ति की अधिसूचना आयोग को उपलब्ध नहीं कराई है। आयोग ने यह भी उल्लेख किया था कि 13 मई 2025 को ही योग्य आईपीएस अधिकारियों का पैनल राज्य सरकार को भेज दिया गया था। नियमों के अनुसार, राज्य सरकार को पैनल में शामिल अधिकारियों में से किसी एक को तत्काल पूर्णकालिक डीजीपी नियुक्त करना था। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के 3 जुलाई 2018 के आदेश का हवाला देते हुए पूछा था कि आखिर अब तक इसका पालन क्यों नहीं किया गया और देरी की वजह क्या है।
प्रभारी डीजीपी बनाए जाने पर उठा था सवाल
दरअसल, राज्य सरकार ने यूपीएससी द्वारा भेजे गए पैनल के आधार पर अरुण देव गौतम को डीजीपी की जिम्मेदारी तो दी थी, लेकिन उन्हें नियमित डीजीपी घोषित करने के बजाय “प्रभारी डीजीपी” के रूप में पदस्थ किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने “प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार” मामले में पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि किसी भी राज्य में प्रभारी डीजीपी की व्यवस्था नहीं चलेगी। इसके बाद 5 फरवरी 2026 को “टी गोपाल राव बनाम यूपीएससी” मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा था कि डीजीपी नियुक्ति में देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि यदि नियुक्ति प्रक्रिया में अनावश्यक देरी हुई तो उसके परिणाम भी सामने आएंगे।
डीजीपी नियुक्ति में UPSC की क्या होती है भूमिका?
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2006 में “प्रकाश सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया” मामले में डीजीपी नियुक्ति को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए थे। कोर्ट ने कहा था कि राज्य सरकारें मनमाने तरीके से डीजीपी नियुक्त नहीं कर सकतीं। निर्देशों के अनुसार, राज्य सरकार को सबसे वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों के नाम UPSC को भेजने होते हैं। आयोग सेवा रिकॉर्ड, अनुभव और कार्यप्रदर्शन के आधार पर उपयुक्त अधिकारियों का पैनल तैयार कर राज्य सरकार को भेजता है। इसके बाद राज्य सरकार को उसी पैनल में से किसी एक अधिकारी को डीजीपी नियुक्त करना होता है।
साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया को और सख्त बनाते हुए कहा था कि राज्य सरकार को मौजूदा डीजीपी के रिटायरमेंट से कम से कम तीन महीने पहले यूपीएससी को प्रस्ताव भेजना होगा। आयोग पैनल तैयार कर राज्य को भेजेगा और राज्य सरकार को तुरंत नियुक्ति करनी होगी। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया था कि नियुक्त डीजीपी का न्यूनतम कार्यकाल दो वर्ष का होगा, भले ही उसकी सेवानिवृत्ति नजदीक ही क्यों न हो।
अरुण देव गौतम का प्रशासनिक और पुलिसिंग सफर
अरुण देव गौतम मूल रूप से उत्तर प्रदेश के कानपुर क्षेत्र से आते हैं। उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने यूपीएससी परीक्षा उत्तीर्ण की और आईपीएस अधिकारी बने। अपने लंबे पुलिस करियर में उन्हें राष्ट्रपति पुलिस पदक, भारतीय पुलिस पदक और संयुक्त राष्ट्र पुलिस पदक जैसे प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं। अरुण देव गौतम का जन्म 2 जुलाई 1967 को कानपुर के निकट स्थित अभयपुर गांव में हुआ था। शुरुआती पढ़ाई उन्होंने अपने गांव के सरकारी स्कूल से की। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद के राजकीय इंटर कॉलेज से 10वीं और 12वीं की शिक्षा पूरी की।
उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से कला संकाय में स्नातक की डिग्री हासिल की और फिर राजनीति शास्त्र में एमए किया। इसके बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), नई दिल्ली से अंतरराष्ट्रीय कानून विषय में एमफिल की उपाधि प्राप्त की। यूपीएससी परीक्षा पास करने के बाद वे वर्ष 1992 बैच के आईपीएस अधिकारी बने। 12 अक्टूबर 1992 को उन्होंने भारतीय पुलिस सेवा जॉइन की। शुरुआत में उन्हें मध्यप्रदेश कैडर आवंटित हुआ था। प्रशिक्षु आईपीएस अधिकारी के रूप में उनकी पहली पोस्टिंग जबलपुर में हुई। बाद में वे बिलासपुर में सीएसपी के रूप में पदस्थ रहे।
कई जिलों में संभाली एसपी की जिम्मेदारी
बिलासपुर में सीएसपी रहने के बाद उन्हें कवर्धा में एसडीओपी बनाया गया। इसके बाद वे भोपाल में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के पद पर रहे। मध्यप्रदेश पुलिस की 23वीं बटालियन में कमांडेंट की जिम्मेदारी भी उन्होंने संभाली। एसपी के तौर पर उनकी पहली नियुक्ति भोपाल जिले में हुई थी। साल 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद अरुण देव गौतम ने छत्तीसगढ़ कैडर का चयन किया। इसके बाद उन्होंने कोरिया, रायगढ़, जशपुर, राजनांदगांव, सरगुजा और बिलासपुर जैसे जिलों में पुलिस अधीक्षक के रूप में सेवाएं दीं।
डीआईजी बनने के बाद उन्हें पुलिस मुख्यालय, सीआईडी, प्रशासन, वित्त एवं योजना और मुख्यमंत्री सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी सौंपी गई। चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों वाले जिलों में उन्हें विशेष तौर पर भेजा जाता था। वर्ष 2009 में राजनांदगांव में हुए नक्सली हमले में पुलिस अधीक्षक सहित 29 जवानों के शहीद होने के बाद उन्हें वहां की कमान संभालने भेजा गया था।
झीरम हमले के बाद मिली बस्तर की जिम्मेदारी
आईजी पद पर पदोन्नति के बाद उन्होंने छत्तीसगढ़ आर्म्ड फोर्स का दायित्व संभाला। बाद में वे बिलासपुर रेंज के आईजी बनाए गए। इससे पहले वे बिलासपुर जिले के एसपी भी रह चुके थे। झीरम घाटी नक्सली हमले के बाद उन्हें बस्तर आईजी की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई। 25 मई 2013 को हुए झीरम हमले में कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं की मौत के बाद बस्तर क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था बड़ी चुनौती बन गई थी। इसके कुछ महीनों बाद विधानसभा चुनाव भी हुए। उस दौरान शांतिपूर्ण और सफल चुनाव कराने में अरुण देव गौतम की महत्वपूर्ण भूमिका मानी गई। उनके कार्यकाल में मतदान प्रतिशत में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई थी।
उन्होंने रेलवे, प्रशिक्षण, भर्ती और यातायात शाखाओं में भी पुलिस महानिरीक्षक के रूप में जिम्मेदारी निभाई। पिछले कुछ वर्षों से वे छत्तीसगढ़ के गृह सचिव के साथ-साथ जेल और परिवहन विभाग का भी दायित्व संभाल रहे थे। इसके अलावा नगर सेना और अग्निशमन सेवाओं का अतिरिक्त प्रभार भी उनके पास रहा।
डीजीपी नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश
सुप्रीम कोर्ट का वर्ष 2006 का फैसला राज्य पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति प्रक्रिया के लिए अहम माना जाता है। अदालत ने स्पष्ट किया था कि राज्य सरकारें यूपीएससी द्वारा सुझाए गए तीन वरिष्ठ अधिकारियों के पैनल में से ही डीजीपी का चयन करेंगी। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा था कि नियुक्त डीजीपी को उसकी रिटायरमेंट तिथि चाहे कितनी भी नजदीक क्यों न हो, कम से कम दो साल का कार्यकाल दिया जाना चाहिए।
डीजीपी बनने के लिए क्या होती है पात्रता
पुलिस महानिदेशक बनने के लिए सामान्य तौर पर 30 वर्ष की सेवा आवश्यक मानी जाती है। हालांकि विशेष परिस्थितियों में केंद्र सरकार इस नियम में छूट दे सकती है। छोटे राज्यों में आईपीएस अधिकारियों का कैडर सीमित होने के कारण केंद्र सरकार ने वहां डीजीपी पद के लिए न्यूनतम सेवा अवधि 25 वर्ष तय की है। हालांकि बड़े राज्यों में अब भी 30 साल की सेवा का प्रावधान लागू है।