बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में एक बेहद गंभीर प्रशासनिक मामला सामने आया है, जिसने स्कूल शिक्षा विभाग की कार्यशैली पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) ने हेड मास्टर पदस्थापना प्रक्रिया में ऐसा खेल कर दिया कि राज्य सरकार की युक्तियुक्तकरण व्यवस्था और डीपीआई (DPI) द्वारा किए गए महीनों के प्रयासों का कोई महत्व ही नहीं रह गया। शिक्षकों की पदस्थापना न केवल मनमर्जी से की गई, बल्कि हाई कोर्ट और डीपीआई दोनों के स्पष्ट आदेशों को भी दरकिनार कर दिया गया। इस मनमाने निर्णय का सीधा असर बच्चों पर पड़ रहा है, क्योंकि कोटा ब्लॉक के तीन स्कूल अब एकल-शिक्षकीय हो चुके हैं, जहाँ शिक्षा की गुणवत्ता स्वतः प्रभावित होना तय है।
कहां से शुरू हुआ विवाद?
स्कूल शिक्षा विभाग ने 29 मार्च 2023 को सहायक शिक्षकों को प्रधान पाठक (हेड मास्टर) के पद पर प्रमोशन दिया था। बिलासपुर DEO ने इसी आदेश के आधार पर पदोन्नति सूची जारी की। लेकिन जब शिक्षकों की काउंसलिंग हुई तो कई शिक्षकों ने अपने पदस्थापना स्थल पर आपत्ति जताई। आपत्ति न सुने जाने पर कुछ शिक्षकों ने सीधे हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी।
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हाई कोर्ट ने सुनवाई के बाद याचिकाकर्ताओं को डीपीआई के समक्ष अभ्यावेदन प्रस्तुत करने का निर्देश दिया और डीपीआई को 29 मार्च 2023 के प्रमोशन आदेश के अनुसार नियमानुसार निर्णय लेने को कहा। याचिकाकर्ताओं ने अभ्यावेदन प्रस्तुत किया और डीपीआई ने विचार-विमर्श के बाद सभी आवेदनों को अस्वीकार कर दिया। डीपीआई ने स्पष्ट रूप से DEO बिलासपुर को यह निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता शिक्षकों की पदस्थापना उसी स्कूल में की जाए, जहाँ वे पहले पदस्थ थे, अन्य किसी भी स्थान पर नहीं। लेकिन यहां से शुरू हुआ “खेला”, जिस पर अब पूरे शिक्षा विभाग में चर्चा है।
DEO ने कैसे किया फर्जीवाड़ा?
डीपीआई का आदेश बेहद स्पष्ट था, याचिकाकर्ता शिक्षकों की पदस्थापना उनके पूर्व के स्कूलों में ही की जानी चाहिए। लेकिन DEO ने:
- न DPI का आदेश माना,
- न हाई कोर्ट के निर्देश,
- बल्कि मनचाहे शिक्षकों को अपनी पसंद के स्कूलों में पोस्टिंग दे दी।
ऐसा करके DEO ने दो महत्वपूर्ण प्राधिकरणों हाई कोर्ट और डीपीआई की अवमानना कर दी। शिक्षक संगठनों का कहना है कि “जब पोस्टिंग मनमुताबिक हो रही है, तो निश्चित ही कुछ न कुछ बड़ा खेल भीतर-भीतर चल रहा है।” इस पर शिक्षा जगत में चर्चा थमने का नाम नहीं ले रही।
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किन शिक्षकों को मिली गलत तरीके से ‘मलाईदार’ पोस्टिंग?
शिक्षकों के नाम और उदाहरण सामने आने से यह खेल और भी स्पष्ट हो जाता है:
- हलधर साहू — पहले पदस्थापना प्राथमिक शाला चारपारा (कोटा) थी, लेकिन DEO ने इन्हें सीधे शहर के राजेंद्र नगर स्कूल में प्रधान पाठक बना दिया।
- शिप्रा बघेल — पहले पोस्टिंग प्राथमिक शाला कन्या खमरिया (मस्तूरी) में थी, लेकिन अब इन्हें पौसरा के स्कूल में भेज दिया गया।
- सूरज कुमार सोनी — पहले पदस्थापना प्राथमिक शाला पुरेना (तखतपुर) थी, मगर इन्हें भटगांव (बिल्हा) भेज दिया गया।
ये तीनों शिक्षक हाई कोर्ट में याचिका दायर करने वाले थे, लेकिन DPI के द्वारा अभ्यावेदन अस्वीकार हो जाने के बाद इन्हें पुराने स्कूल में ही जाना था जिसे DEO ने अनदेखा कर दिया।
नियमों का खुला उल्लंघन, जिन्होंने याचिका दायर भी नहीं की, उन्हें भी मनचाही पोस्टिंग
यही नहीं, जिन शिक्षकों ने हाई कोर्ट में याचिका तक दायर नहीं की थी, उन्हें भी प्रधान पाठक के पद पर उनकी मनपसंद जगह पदस्थापना दे दी गई। यह सीधी अवमानना और 2024 के पदस्थापना आदेश का घोर उल्लंघन है। आदेश में साफ लिखा है कि:
- “10 दिन के भीतर कार्यभार ग्रहण न करने पर पदस्थापना स्वतः निरस्त मानी जाएगी।”
इसके बावजूद DEO ने ऐसे शिक्षकों को भी पदस्थ कर दिया जिनकी कोई वैधानिक मांग या दावा ही नहीं था।
कोटा ब्लॉक में तीन स्कूल एकल-शिक्षकीय, यही है DEO का ‘खेला’
नंदनी कौशिक सहित कुल 6 शिक्षकों को ऐसे स्कूलों में पदस्थ कर दिया गया जहाँ अतिरिक्त शिक्षक की आवश्यकता नहीं थी। नतीजा: कोटा ब्लॉक के तीन स्कूलों में अब केवल एक-एक शिक्षक बचा है। यह प्रदेश की युक्तियुक्तकरण नीति का सीधा मज़ाक है। इसका खामियाज़ा बच्चों को उठाना पड़ रहा है।
हाई कोर्ट ने दिया था स्पष्ट आदेश, DPI को 15 दिन में अभ्यावेदन का निराकरण करना था
16 अप्रैल 2025 को हाई कोर्ट ने हलधर साहू और अन्य शिक्षकों की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा था:
- शिक्षक 15 दिनों के भीतर DPI को अभ्यावेदन दें।
- DPI 15 दिनों के भीतर निर्णय ले।
- 30 दिनों तक शिक्षक अपने पुराने स्कूल में कार्य कर सकें।
DPI ने आदेश का पालन करते हुए 4 सितंबर 2025 को अभ्यावेदन अस्वीकार कर दिया। यानी इन शिक्षकों को उनके पुराने स्कूल में ही पदस्थ होना था।
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DEO ने DPI और कोर्ट दोनों को गुमराह किया और खेल शुरू हुआ
अभ्यावेदन खारिज होने के बाद DEO को केवल इतना करना था कि शिक्षकों को उनके पुराने स्कूलों में पोस्टिंग दे देता। लेकिन DEO ने:
- आदेश की गलत व्याख्या की,
- DPI के फैसले को उलटकर रख दिया,
- और हाई कोर्ट के निर्देश का पूर्णतः उल्लंघन कर डाला।
यही नहीं, अवमानना याचिका चल रही थी, इसलिए जल्दबाज़ी में मनमुताबिक पोस्टिंग आदेश जारी कर दिए गए ताकि केस वापस लिया जा सके। ठीक यही हुआ, अगली सुनवाई में याचिकाकर्ताओं ने केस वापस ले लिया।
कानून क्या कहता है? आदेश का पालन अनिवार्य है
जेडी आर.पी. आदित्य ने स्पष्ट कहा है:
“हाई कोर्ट के आदेश का पालन करना अनिवार्य है। DPI ने अभ्यावेदन निरस्त कर दिया था, ऐसे में DEO किस आधार पर दूसरी जगह पदस्थापना कर रहा है, इसकी जानकारी तलब की जाएगी।”
यह बयान इस बात का संकेत है कि मामला अब कार्रवाई की ओर बढ़ सकता है।
निष्कर्ष: क्या DEO कानून से ऊपर है?
पूरा प्रकरण कई गंभीर प्रश्न खड़ा करता है:
- जब DPI ने आदेश जारी किया था, तो DEO ने उसे क्यों नजरअंदाज किया?
- हाई कोर्ट के आदेश की अवहेलना करने की हिम्मत किस आधार पर हुई?
- क्या यह पोस्टिंग सिर्फ “चयनित शिक्षकों को लाभ पहुंचाने” के लिए की गई?
- तीन स्कूलों को एकल-शिक्षकीय बनाने का जिम्मेदार कौन है?
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यह मामला अब सिर्फ प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि एक गहरे पोस्टिंग घोटाले के रूप में उभर रहा है। शिक्षा से खिलवाड़ करने वाले ऐसे निर्णय न केवल विभागीय संरचना को कमजोर करते हैं, बल्कि बच्चों के भविष्य से भी समझौता करते हैं। यदि इस पर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो यह उदाहरण आगे और बड़े फर्जीवाड़ों को जन्म देगा।








