दिल्ली। रिटायर्ड IPS अधिकारियों के संगठन फोरम ऑफ रिटायर्ड IPS ऑफिसर्स (FORIPSO) ने केंद्र सरकार की पेंशन व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। फोरम का आरोप है कि पेंशन नियमों के माध्यम से 1 जनवरी 2006 से पहले और बाद में रिटायर हुए पेंशनरों के बीच मनमाना भेदभाव किया जा रहा है, जिससे समानता के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन होता है। मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की डिवीजन बेंच ने कानून, वित्त तथा पेंशन विभागों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। सुनवाई बेंच में जस्टिस के. वी. विश्वनाथन व जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले शामिल हैं।
मुद्दे का इतिहास और फोरम की दलीलें
फोरम का कहना है कि फाइनेंस एक्ट 2025 के पार्ट IV में पेंशन से जुड़ी कुछ व्यवस्थाओं को पिछली तारीख से लागू किया गया, जिसका उद्देश्य दिल्ली हाईकोर्ट के 20 मार्च 2024 के आदेश के प्रभाव को समाप्त करना था। दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 4 अक्टूबर 2024 को बरकरार रखा था। दोनों आदेशों का निहितार्थ यह था कि रिटायरमेंट तिथि के आधार पर पेंशन में अंतर नहीं किया जा सकता। FORIPSO का तर्क है कि फाइनेंस एक्ट के प्रावधान आर्टिकल 14 के खिलाफ हैं क्योंकि वे समान परिस्थितियों में वाले व्यक्तियों के साथ असमान व्यवहार को वैध कर देते हैं।
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पहली बार यह विवाद 2012 में सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल में उठा। तब 6th Central Pay Commission की सिफारिशों और 1 सितंबर 2008 के ऑफिस मैमोरेंडम के आधार पर रिटायरमेंट तिथि के हिसाब से पेंशन में भेदभाव को चुनौती दी गई थी। CAT ने 15 जनवरी 2015 के आदेश में उस ऑफिस मैमोरेंडम को रद्द कर दिया था और कहा था कि रिटायरमेंट तिथि के आधार पर पेंशन में अंतर संवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता।
फैसलों और लागू नीतियों का क्रम
मुद्दा 7th CPC की सिफारिशों से फिर उभरा, जिसमें 2016 से पहले और बाद में रिटायर होने वालों के बीच भेदभाव की बात दोहराई गई। दिल्ली हाईकोर्ट ने 2024 के आदेश में स्पष्ट किया कि 1 जनवरी 2006 की कटऑफ तिथि पर आधारित भेदभाव सही नहीं है और संबंधित अधिकारियों को बकाया राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया गया। इसके बाद केंद्र सरकार के खिलाफ अवमानना याचिका दाखिल की गई और सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने 4 अक्टूबर 2024 को सरकार की चुनौती को खारिज किया था। इसके बावजूद वित्त अधिनियम के प्रावधानों का हवाला देते हुए सरकार ने आदेशों का अनुपालन टालने की कोशिश की, जिस पर फोरम ने सुप्रीम कोर्ट में नया कदम उठाया है।
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वर्तमान स्थिति और सुनवाई का रूटमैप
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में संबंधित केंद्र सरकार विभागों से विस्तृत जवाब मांगा है। साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि एक ही विषय से जुड़े अन्य याचिकाओं को भी एक साथ सूचीबद्ध किया जाए ताकि सभी संबंधित पक्षों की दलीलों को समेकित रूप से सुना जा सके। अदालत ने पहले भी निर्देश दिया था कि यदि आदेशों के कारण बकाया राशि बनती है तो उसका निपटारा निर्धारित समय में करना चाहिए, पर वित्तीय अधिनियम के लागू होने के बाद स्थितियों में जटिलता आ गई है।
कठिनाई और पेंशनभोगियों की चिंता
इस मुकदमे का प्रभाव सीधे उन रिटायर्ड अफसरों पर पड़ेगा जिनका रिटायरमेंट 1 जनवरी 2006 के आसपास हुआ। यदि सुप्रीम कोर्ट फोरम के पक्ष में फैसला देता है तो सरकार को पूर्व में दिए गए आदेशों के अनुरूप बकाया और समतुल्य पेंशनें देनी पड़ सकती हैं। दूसरी ओर अगर केंद्र सरकार के तर्कों को अदालत स्वीकार कर लेती है तो वर्तमान पेंशन व्यवस्था बरकरार रहेगी, जिससे वैसी ही कटऑफ तिथियों पर आधारित विभिन्नता जारी रहेगी। दोनों स्थितियों में लंबित कानूनी प्रक्रियाओं और वित्तीय दायित्वों को लेकर सरकार, वित्त विभाग और पेंशनर्स के बीच राजनीतिक तथा आर्थिक बहस जारी रहने की संभावना है।








