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रिटायरमेंट के बाद भी मिलेगा प्रमोशन का लाभ, जल संसाधन विभाग के कर्मचारी की याचिका पर हाई काेर्ट का महत्वपूर्ण आदेश

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बिलासपुर। पदोन्नति के मामले में विभागीय अफसरों की अनदेखी को लेकर हाई कोर्ट ने नाराजगी जताई है। कोर्ट ने साफ कहा है कि यह न्यायालय मूक दर्शक नहीं बना रह सकता, जब किसी कर्मचारी को नियोक्ता की मनमानी और अस्पष्ट देरी के कारण उसके वैध पदोन्नति और वरिष्ठता अधिकारों से वंचित किया जाता है। जस्टिस एके प्रसाद ने अपने फैसले में कहा है, चूंकि याचिकाकर्ता रिटायर हो गए हैं लिहाजा विभागीय अधिकारी उन्हें कानून के अनुसार शीघ्रता से, उनकी संशोधित वरिष्ठता के आधार पर, पेंशन प्रयोजनों के लिए वेतन निर्धारण और सेवानिवृत्ति देय राशि की पुनर्गणना सहित सभी काल्पनिक लाभ प्रदान करेंगे।

सालिकराम चंद्राकर ने अधिवक्ता स्वाति वर्मा के जरिए हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता ने याचिका में कहा है कि से 8-अगस्त -2022 की तिथि से सहायक अनुसंधान अधिकारी के पद पर पदोन्नत करने के अलावा 07 मई 2012 की तिथि से वरिष्ठता के सभी लाभ दिए जाए। वह भारत सरकार के जल संसाधन विभाग में तटबंध निरीक्षक के पद पर रुद्री धमतरी में कार्यरत थे। याचिकाकर्ता छत्तीसगढ़ के निवासी हैं और रुद्री में तैनात रहे हैं। वर्तमान तैनाती से पहले, वह प्रयोगशाला सहायक ग्रेड-बी (प्रयोगशाला सहायक) के पद पर कार्यरत था। याचिकाकर्ता ने विभागीय नियमों का हवाला देते हुए बताया कि तटबंध निरीक्षक के पद पर पदोन्नति के लिए पात्रता मानदंड प्रयोगशाला सहायक ग्रेड-ए (प्रयोगशाला तकनीशियन) के कैडर में 8 वर्ष की अर्हक सेवा और प्रयोगशाला सहायक ग्रेड-बी (प्रयोगशाला सहायक) के कैडर में 12 वर्ष की अर्हक सेवा है।

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11 फरवरी 2011 के आदेश के अनुसार, विभाग ने एक वरिष्ठता सूची जारी की जिसमें उसे सुरेंद्र तिवारी के ठीक नीचे रखा गया था, जो उसी के बराबर वरिष्ठ थे। उक्त आदेश के अंतिम अनुच्छेद में विभाग ने स्वयं यह दर्ज किया कि, “नियमों के अनुसार, प्रयोगशाला सहायक और प्रयोगशाला तकनीकी कैडर से तटबंध निरीक्षक के 25% पदों पर पदोन्नति स्पष्ट नहीं है, इसलिए इस पद के संबंध में निर्देश/निर्णय जारी किए जाएं।” 07 मई 2012 को विभाग ने पदोन्नति का आदेश जारी किया जिसके तहत सुरेंद्र कुमार तिवारी को तटबंध निरीक्षक के पद पर पदोन्नत किया गया। इसके बाद उसने सक्षम प्राधिकारी के समक्ष इसी प्रकार की राहत की मांग करते हुए एक अभ्यावेदन प्रस्तुत किया, हालांकि, विभाग ने 25 अक्टूबर 2014 के उत्तर में याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन को अस्वीकार कर दिया। इस आधार पर दावा किया गया कि तटबंध निरीक्षक का कोई पद उपलब्ध नहीं था।

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इसके बाद 01 फरवरी 2019 के आदेश के अनुसार, उसको तटबंध निरीक्षक के पद पर पदोन्नति दी गई, हालांकि लगभग 10 वर्षों की अनुचित देरी के बाद। याचिकाकर्ता को 2007 से 2012 के बीच पदोन्नत किया जाना चाहिए था। इसके बाद विभाग ने 07 अप्रैल 2022 को तटबंध निरीक्षक पदों की एक निर्धारित सूची प्रकाशित की, जिसमें यह पुनः उल्लेख किया गया कि रिनू टोप्पो और अरुण कुमार टंडन को 07 मई 2012 को तटबंध निरीक्षक के पद पर पदोन्नत किया गया था, और यह भी कि इस कैडर में 25% पद 50:50 के अनुपात में प्रयोगशाला सहायक और प्रयोगशाला तकनीकी कैडर से भरे जाएंगे। इसके बाद, 08 सितंबर 2022 के आदेश के माध्यम से, विभाग ने रिनू टोप्पो और अरुण कुमार टंडन को सहायक अनुसंधान अधिकारी के पद पर पदोन्नत किया, जबकि याचिकाकर्ता को न तो पदोन्नति दी गई और न ही वरिष्ठता के परिणामी लाभ प्रदान किए गए। इससे व्यथित होकर याचिकाकर्ता ने 27 सितंबर 2022 को विभाग के समक्ष एक विस्तृत अभ्यावेदन प्रस्तुत किया, जिसमें यह स्पष्टीकरण मांगा गया कि वरिष्ठता सूची में उसकी श्रेष्ठ स्थिति के बावजूद उसके कनिष्ठों को पदोन्नति के लाभ कैसे दिए गए, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। याचिकाकर्ता ने अधिकार के तहत भी एक आवेदन दायर किया।

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RTI के खुलासे के बाद दायर की याचिका

याचिकाकर्ता ने 04 नवंबर 2022 को सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत एक आवेदन भी दायर किया था जिसमें पदोन्नत उम्मीदवारों की वरिष्ठता स्थिति और याचिकाकर्ता की वरिष्ठता को दरकिनार करते हुए उनकी पदोन्नति के लिए लागू नियमों के बारे में जानकारी मांगी गई थी; हालांकि, प्राधिकरण ने कोई जवाब नहीं दिया। इसलिए, यह याचिका दायर की गई है।

अधिवक्ता स्वाती वर्मा ने कहा: अधिकारियों ने नियमों का किया है उल्लंघन

याचिकाकर्ता की अधिवक्ता सुश्री स्वाति वर्मा का कहना है कि प्रतिवादी अधिकारियों ने तटबंध निरीक्षक के पद पर पदोन्नति से संबंधित वैधानिक नियमों का पालन नहीं किया है, जिसके परिणामस्वरूप याचिकाकर्ता को गंभीर नुकसान हुआ है। उनका कहना है कि याचिकाकर्ता वर्ष 2011 में ही पदोन्नति के लिए पात्र हो गए थे, फिर भी उनकी पदोन्नति को मनमाने ढंग से लगभग 10 वर्षों तक निराधार आधारों पर रोक दिया गया, जबकि उनके कनिष्ठों को उनसे पहले पदोन्नत कर दिया गया। अनुसूची-IV के नियम 13 में स्पष्ट रूप से यह प्रावधान है कि तटबंध निरीक्षक के 25% पद पदोन्नति द्वारा भरे जाने हैं, जिसमें प्रयोगशाला सहायक और प्रयोगशाला तकनीकी कैडर के बीच 50:50 का कोटा निर्धारित है। इस स्पष्ट प्रावधान के बावजूद, वरिष्ठ और पात्र होने के बावजूद याचिकाकर्ता को 2012 की पदोन्नति प्रक्रिया में नजरअंदाज कर दिया गया। 11 फरवरी 2011 के विभागीय आदेश में भी पदोन्नति कोटा में अस्पष्टता को स्वीकार किया गया था, फिर भी इस मुद्दे को हल करने के बजाय, विभागीय अधिकारियों ने याचिकाकर्ता के मामले को इस प्रक्रियात्मक अनिश्चितता में फंसा रहने दिया, जिससे उसके वैध अधिकार का हनन हुआ।

याचिकाकर्ता के साथ अधिकारियों ने किया अन्याय

याचिकाकर्ता को अंततः 2019 में पदोन्नत किया गया, लेकिन अत्यधिक देरी के कारण उन्हें 10 वर्षों की वरिष्ठता का नुकसान हुआ, जिससे 13 वर्ष से अधिक कम सेवा वाले कनिष्ठों को सहायक अनुसंधान अधिकारी के पद पर बाद की पदोन्नति में उनसे आगे निकलने का अवसर मिला। कनिष्ठों की पदोन्नति में पारदर्शिता की मांग करने वाले उनके आरटीआई प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया गया, जो प्रतिवादियों के मनमाने और टालमटोल वाले आचरण को दर्शाता है। याचिकाकर्ता के अभ्यावेदनों को या तो अनदेखा किया गया या वरिष्ठता लाभों में देरी या अनुचित रूप से वंचित किए जाने के महत्वपूर्ण मुद्दे को संबोधित किए बिना यांत्रिक रूप से उत्तर दिया गया। वकील का तर्क है कि विवादित कार्रवाई भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है, साथ ही प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। याचिकाकर्ता का सेवा रिकॉर्ड बेदाग है और वह अपने परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य है, साथ ही वह 30 अगस्त 2023 को सेवानिवृत्त हो गया था, इसलिए उचित पदोन्नति और वरिष्ठता से वंचित करना गंभीर अन्याय है, जिसके लिए इस न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता है।

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राज्य शासन ने दिया ये तर्क

राज्य सरकार की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ताओं ने बताया कि वर्ष 2022 की डीपीसी बैठक में विचाराधीन मामले में, याचिकाकर्ता सहायक अनुसंधान अधिकारी के पद पर पदोन्नति के लिए अनुशंसित होने हेतु आवश्यक मानदंडों या वरिष्ठता क्रम को पूरा नहीं करता था, इसलिए उसके नाम पर विचार नहीं किया जा सका।

हाई कोर्ट ने कहा- दस्तावेजों से साफ है, याचिकाकर्ता पदोन्नति का था हकदार

मामले की सुनवाई जस्टिस एके प्रसाद के सिंगल बेंच में हुई। जस्टिस प्रसाद ने अपने फैसले में लिखा है कि दस्तावेजों से यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता वर्ष 2011-2012 में ही तटबंध निरीक्षक के पद पर पदोन्नति के लिए विधिवत पात्र थे, लागू भर्ती नियमों के अनुसार, जिनमें यह अनिवार्य है कि 25% पद पदोन्नति द्वारा भरे जाएं, जिनमें से 50% प्रयोगशाला सहायक ग्रेड-ए (प्रयोगशाला तकनीशियन) और 50% प्रयोगशाला सहायक ग्रेड-बी (प्रयोगशाला सहायक) से हो। 11 फरवरी 2011 की वरिष्ठता सूची में याचिकाकर्ता सुरेंद्र कुमार तिवारी के ठीक नीचे थे और उन्हें विचार के लिए पूर्णतः पात्र दर्शाया गया था। उसी दस्तावेज़ में यह भी दर्ज है कि विभाग ने स्वयं पदोन्नति कोटा के संबंध में अस्पष्टता और स्पष्ट दिशानिर्देशों के अभाव को स्वीकार किया था, जिसके परिणामस्वरूप पदोन्नति में कठिनाई हुई। याचिकाकर्ता के मामले का मूल्यांकन नियमों के अनुसार नहीं किया गया था।

पात्र होने के बावजूद, याचिकाकर्ता को 3 मई 2012 को आयोजित विभागीय समिति (डीपीसी) में पदोन्नति के लिए विचार नहीं किया गया और केवल सुरेंद्र कुमार तिवारी को 7 मई 2012 के आदेश द्वारा पदोन्नत किया गया। विभाग ने याचिकाकर्ता के दावे को दरकिनार करने का कोई ठोस कारण नहीं बताया। 25 अक्टूबर 2014 के उत्तर में “पद की अनुपलब्धता” का जो तर्क दिया गया है, वह रिकॉर्ड में दर्ज इस तथ्य से खंडित होता है कि सभी पदोन्नति पद केवल प्रयोगशाला तकनीशियन कैडर से ही भरे गए थे, जिससे प्रयोगशाला सहायक कैडर से केवल एक व्यक्ति को ही पदोन्नति मिली, जिसके परिणामस्वरूप अनिवार्य 50-50% वितरण का उल्लंघन हुआ।

यह स्वीकार किया गया है कि याचिकाकर्ता को पहली पदोन्नति 01 फरवरी 2019 को दी गई थी, जो उनकी पात्रता के लगभग 10 वर्ष बाद थी, और इस देरी का कोई कारण नहीं बताया गया था। इस देरी के कारण, याचिकाकर्ता ने न केवल 10 वर्ष की वरिष्ठता खो दी, बल्कि वे वरिष्ठता में अपने से काफी नीचे के व्यक्तियों से भी कनिष्ठ हो गए, जिनमें रिनू टोप्पो और अरुण कुमार टंडन शामिल हैं, जिन्हें बाद में 08 सितंबर 2022 के आदेश द्वारा सहायक अनुसंधान अधिकारी के पद पर पदोन्नत किया गया। यह भी स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता द्वारा वरिष्ठता, पात्रता, कोटा के दुरुपयोग और अनुचित रोस्टर आवंटन से संबंधित मूलभूत मुद्दों को उठाते हुए कई अभ्यावेदन, जिनमें 27 सितंबर 2022 का विस्तृत अभ्यावेदन और 04 नवंबर.2022 का आरटीआई आवेदन शामिल हैं, दायर किए गए थे। याचिकाकर्ता के दावे को खारिज करने वाला 03 जनवरी2023 का विवादित आदेश यांत्रिक, निरर्थक और पूरी तरह से विवेकहीन है। याचिकाकर्ता की किसी भी मुख्य शिकायत पर विचार नहीं किया गया।

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कोई भी प्रशासनिक प्राधिकरण अपनी गलती का फायदा नहीं उठा सकता

हाई काेर्ट ने अपने फैसले में लिखा है कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होता है कि विभाग ने 2022 की पदोन्नति पर विचार करते समय केवल अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षण के आधार पर ही भरोसा किया, लेकिन याचिकाकर्ता के 2011-2012 में अर्जित पूर्व अधिकार को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया, जब रोस्टर ठीक से लागू नहीं किया गया था और याचिकाकर्ता के मामले पर गैरकानूनी रूप से विचार नहीं किया गया था। यह सर्वविदित कानून है कि कोई भी प्रशासनिक प्राधिकरण अपनी गलती का फायदा नहीं उठा सकता, और न ही बाद में जारी किया गया आरक्षण रोस्टर पहले के अवैध अतिक्रमण को उचित ठहरा सकता है।

विभागीय अफसरों की बहानेबाजी अनुचित

2011-2012 में तटबंध निरीक्षक के पद पर पदोन्नति के लिए उम्मीदवारी स्पष्ट रूप से मनमानी है, जो लागू भर्ती नियमों के विपरीत है और भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत संवैधानिक आदेश का उल्लंघन है। रिकॉर्ड से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि याचिकाकर्ता ने पदोन्नति के लिए सभी पात्रता मानदंडों को पूरा किया था; फिर भी बिना किसी ठोस कारण के लगभग एक दशक तक उसके उचित विचार को स्थगित रखा गया। “पदों की अनुपलब्धता” का विभागीय बहाना कोटा में अस्पष्टता और 50:50 पदोन्नति वितरण के अनुचित कार्यान्वयन के संबंध में विभाग की स्वयं की स्वीकारोक्ति से खंडित होता है, जिससे याचिकाकर्ता पर विचार न करना पूरी तरह से अनुचित हो जाता है।

हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

वर्तमान मामले में, याचिकाकर्ता 30 अगस्त 2023 को एक बेदाग सेवाकाल के बाद सेवानिवृत्त हुए। उनके साथ हुआ अन्याय रिकॉर्ड से स्पष्ट है और यह पूरी तरह से विभागीय अधिकारियों की प्रशासनिक निष्क्रियता और नियमों के दुरुपयोग के कारण है। यह न्यायालय मूक दर्शक नहीं बना रह सकता, जब किसी कर्मचारी को नियोक्ता की मनमानी और अस्पष्ट देरी के कारण उसके वैध पदोन्नति और वरिष्ठता अधिकारों से वंचित किया जाता है।

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हाई कोर्ट ने राज्य शासन काे जारी किया महत्वपूर्ण आदेश

  • 3 मई 2012 को आयोजित डीपीसी. में याचिकाकर्ता को तटबंध निरीक्षक के पद पर पदोन्नति के लिए विचार न करना अवैध, मनमाना और भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन घोषित किया जाता है।
  • याचिकाकर्ता को उसके तत्काल वरिष्ठ और कनिष्ठों के साथ 07 मई 2012 को तटबंध निरीक्षक के पद पर पदोन्नति के लिए विचार किया गया माना जाएगा।
  • याचिकाकर्ता तटबंध निरीक्षक के कैडर में काल्पनिक वरिष्ठता का हकदार होगा, उसे वरिष्ठता सूची में वह उचित स्थान आवंटित करके जो उसे वर्ष 2012 में विचार किए जाने और पदोन्नत किए जाने पर प्राप्त होता।


चूंकि याचिकाकर्ता 30 अगस्त 2023 को पहले ही सेवानिवृत्त हो चुके हैं,

उन्हें उन पदोन्नति पदों के लिए वेतन के बकाया का हकदार नहीं माना जाएगा जिन्हें उन्होंने वास्तव में धारण नहीं किया है; हालांकि, विभागीय अधिकारी उन्हें कानून के अनुसार शीघ्रता से, उनकी संशोधित वरिष्ठता के आधार पर, पेंशन प्रयोजनों के लिए वेतन निर्धारण और सेवानिवृत्ति देय राशि की पुनर्गणना सहित सभी काल्पनिक लाभ प्रदान करेंगे।


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