Bilaspur High Court News: बिलासपुर। छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने कर्मचारियों और उनके आश्रित परिवारों के हित में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों से अतिरिक्त भुगतान की वसूली कानूनन प्रतिबंधित है। यदि कथित अतिरिक्त भुगतान पांच वर्ष से अधिक पुराना है, तो उसकी रिकवरी नहीं की जा सकती। हाई कोर्ट ने दिवंगत कर्मचारी की विधवा से 12.19 लाख रुपये की वसूली के आदेश को निरस्त करते हुए सरकार को 40 दिनों के भीतर लंबित भुगतान जारी करने का निर्देश दिया है।
विधवा से 12 लाख की रिकवरी पर हाई कोर्ट की रोक
छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने मृत शासकीय कर्मचारी के परिवार को बड़ी राहत देते हुए कहा है कि कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसके आश्रितों पर लाखों रुपये की रिकवरी का बोझ डालना न केवल कानून के विपरीत है, बल्कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का भी उल्लंघन है।
जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच ने राजस्व विभाग द्वारा जारी 12 लाख 19 हजार 278 रुपये की रिकवरी के आदेश को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने कहा कि बिना नोटिस और सुनवाई का अवसर दिए इस प्रकार की कार्रवाई स्वीकार नहीं की जा सकती।
पढ़िए क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता अंजू मिश्रा, निवासी अयोध्या नगर बिलासपुर, के पति स्वर्गीय सुरेश कुमार मिश्रा राजस्व विभाग में तखतपुर तहसील कार्यालय में तृतीय श्रेणी कर्मचारी के रूप में कार्यरत थे। 27 जून 2025 को सेवाकाल के दौरान उनका निधन हो गया। पति की मृत्यु के कुछ महीनों बाद 10 मार्च 2026 को तहसीलदार तखतपुर ने आदेश जारी कर कहा कि वर्ष 2006 से 2025 तक गलत वेतन निर्धारण के कारण उन्हें 12 लाख 19 हजार 278 रुपये का अतिरिक्त भुगतान किया गया, जिसकी वसूली की जाएगी। इस आदेश को चुनौती देते हुए अंजू मिश्रा ने अपने अधिवक्ता पवन श्रीवास्तव के माध्यम से हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की।
याचिकाकर्ता ने क्या कहा?
याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि दिवंगत कर्मचारी के जीवित रहते कभी भी विभाग ने न तो अतिरिक्त भुगतान की जानकारी दी और न ही कोई रिकवरी नोटिस जारी किया। अधिवक्ता ने तर्क दिया कि कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसकी विधवा पर बिना किसी कारण बताओ नोटिस और सुनवाई के लाखों रुपये की वसूली थोपना पूरी तरह मनमाना और अवैध है।
राज्य सरकार ने दिया यह तर्क
राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि ऑडिट और विभागीय जांच में गलत वेतन निर्धारण का मामला सामने आया था। सरकारी धन की वसूली करना शासन का अधिकार है और यह आदेश छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1976 के नियम 65 के तहत जारी किया गया था।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस बीडी गुरु ने पाया कि कथित अतिरिक्त भुगतान वर्ष 2006 से 2025 के बीच का है। कर्मचारी के सेवाकाल में कभी भी कोई नोटिस जारी नहीं किया गया था।
कोर्ट ने कहा कि:
- कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी को बिना सुनवाई का अवसर दिए रिकवरी आदेश जारी करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
- तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों से अतिरिक्त भुगतान की वसूली कानूनन प्रतिबंधित है।
- पांच वर्ष से अधिक पुराने अतिरिक्त भुगतान की रिकवरी नहीं की जा सकती।
- विभाग अपनी प्रशासनिक त्रुटियों का बोझ कर्मचारी या उसके परिवार पर नहीं डाल सकता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि निम्न श्रेणी के कर्मचारियों से लंबे समय बाद की जाने वाली रिकवरी अन्यायपूर्ण और अवैध मानी गई है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में कर्मचारी विभाग द्वारा तय वेतन पर विश्वास करता है और वर्षों बाद उससे राशि वापस मांगना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
40 दिनों में करना होगा भुगतान
हाई कोर्ट ने 10 मार्च 2026 के रिकवरी आदेश को निरस्त करते हुए राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि दिवंगत कर्मचारी के लंबित सेवा लाभ, पेंशन संबंधी देयक और अन्य फंड का सत्यापन कर 40 दिनों के भीतर याचिकाकर्ता अंजू मिश्रा को भुगतान किया जाए।
फैसले की मुख्य बातें
- तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों से अतिरिक्त भुगतान की रिकवरी प्रतिबंधित।
- पांच वर्ष से अधिक पुराने भुगतान की वसूली नहीं की जा सकती।
- कर्मचारी की मृत्यु के बाद आश्रित परिवार से रिकवरी नहीं की जा सकती।
- बिना नोटिस और सुनवाई के जारी रिकवरी आदेश अवैध।
- राज्य सरकार को 40 दिनों के भीतर सभी लंबित भुगतान जारी करने का निर्देश।