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Bilaspur High Court News: आपराधिक मामले में बरी होने से विभागीय जांच खत्म नहीं होती, हाई कोर्ट ने खारिज की आरक्षकों की याचिका

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Bilaspur High Court News: बिलासपुर। छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने विभागीय कार्रवाई और आपराधिक मुकदमे के संबंध में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी कर्मचारी का आपराधिक मामले में बरी हो जाना, विभागीय जांच और उसमें दी गई सजा को स्वतः समाप्त नहीं करता। कोर्ट ने 19 साल पुराने कैदी फरारी प्रकरण में बर्खास्त किए गए दो आरक्षकों की सेवा बहाली संबंधी याचिका खारिज कर दी है। अब दोनों आरक्षकों ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

19 साल पुराने फरारी कांड में नहीं मिली राहत

न्यायिक अभिरक्षा में बंद एक आरोपी को पेशी के दौरान फरार होने का अवसर देने के आरोप में सेवा से बर्खास्त किए गए दो पूर्व आरक्षकों को हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली है। जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की सिंगल बेंच ने उनकी सेवा बहाली की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए विभागीय कार्रवाई को वैध माना है।

हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ दोनों पूर्व आरक्षकों ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में 13 जुलाई 2026 की तिथि निर्धारित की है।

पढ़िए क्या है पूरा मामला?

याचिकाकर्ता सुरेश यादव और बुधना राम भगत वर्ष 2006 में रायपुर में आरक्षक पद पर पदस्थ थे। 30 जनवरी 2006 को उन्हें आरोपी राहुल उर्फ अशोक शिंदे को न्यायालय में पेश करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

आरोप है कि दोनों आरक्षकों ने आरोपी को पर्याप्त सुरक्षा में नहीं रखा और उसे पावर हाउस क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से घूमने का अवसर दिया। इसी दौरान आरोपी ने एक व्यापारी से उगाही की। बाद में उसे निजी वाहन से राजनांदगांव ले जाया गया, जहां उसे दुकान और रिश्तेदारों के यहां जाने की अनुमति भी दी गई। इसी दौरान वह पुलिस अभिरक्षा से फरार हो गया।

विभागीय जांच में आरोप पाए गए सही

घटना के बाद विभागीय जांच शुरू की गई। जांच अधिकारी ने दोनों आरक्षकों पर लगाए गए आरोपों को प्रमाणित माना। रिपोर्ट के आधार पर कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और 23 दिसंबर 2006 को दोनों को सेवा से पृथक कर दिया गया। इसके बाद दोनों की विभागीय अपील भी 16 मई 2007 को खारिज कर दी गई।

आपराधिक मामले में बरी होने के बाद मांगी बहाली

फरारी प्रकरण को लेकर दोनों आरक्षकों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 223 के तहत आपराधिक मामला भी दर्ज किया गया था। मामले की सुनवाई के बाद न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) ने 30 जुलाई 2015 को दोनों को दोषमुक्त कर दिया।

आपराधिक मामले में बरी होने के बाद दोनों आरक्षकों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर सेवा बहाली की मांग की। उनका तर्क था कि जब आपराधिक अदालत ने उन्हें दोषमुक्त कर दिया है, तो विभागीय दंड भी समाप्त माना जाना चाहिए।

राज्य सरकार ने किया विरोध

राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि आपराधिक मुकदमे और विभागीय जांच की प्रकृति अलग-अलग है। विभागीय जांच में आरोपी को फरार होने देने, सुरक्षा व्यवस्था में गंभीर लापरवाही और कर्तव्यहीनता जैसे आरोपों की जांच की गई थी, जो उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर प्रमाणित पाए गए।

हाई कोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की सिंगल बेंच ने कहा कि विभागीय जांच पूरी प्रक्रिया के अनुसार की गई थी और कर्मचारियों को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर दिया गया था। प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन भी किया गया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:

  • विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमे की प्रकृति अलग होती है।
  • आपराधिक मामले में बरी होने मात्र से विभागीय कार्रवाई स्वतः समाप्त नहीं हो जाती।
  • विभागीय दंड को केवल इस आधार पर निरस्त नहीं किया जा सकता कि कर्मचारी आपराधिक अदालत से दोषमुक्त हो गया है।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित होता है और अदालत विभागीय जांच में दर्ज तथ्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं करती, बल्कि केवल प्रक्रिया की वैधता की जांच करती है।

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला

हाई कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद दोनों पूर्व आरक्षकों ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका में आवश्यक संशोधन के लिए एक सप्ताह का समय देते हुए मामले को सुनवाई के लिए 13 जुलाई 2026 को सूचीबद्ध किया है।

टाइम लाइन

  • 30 जनवरी 2006 – आरोपी राहुल उर्फ अशोक शिंदे पेशी के दौरान फरार हुआ।
  • 23 दिसंबर 2006 – दोनों आरक्षक सेवा से बर्खास्त किए गए।
  • 16 मई 2007 – विभागीय अपील खारिज।
  • 30 जुलाई 2015 – JMFC कोर्ट ने दोनों को आपराधिक मामले में बरी किया।
  • 20 फरवरी 2025 – हाई कोर्ट ने सेवा बहाली की याचिका खारिज की।
  • 16 जून 2026 – सुप्रीम कोर्ट ने SLP में संशोधन के लिए समय दिया।
  • 13 जुलाई 2026 – सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई प्रस्तावित।


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