बिना विभागीय जांच बर्खास्तगी पर हाई कोर्ट की रोक

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बिलासपुर। धमतरी जिले के मगरलोड जनपद पंचायत अंतर्गत पांच शिक्षकों की बर्खास्तगी पर बिलासपुर हाई कोर्ट ने रोक लगा दी है। सिंगल बेंच जस्टिस पीपी साहू ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि बिना विभागीय जांच किसी भी शासकीय कर्मचारी को सेवा से पृथक नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने इस आधार पर जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा जारी बर्खास्तगी आदेश को स्थगित कर दिया है। मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कहा कि छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम 1966 के तहत विभागीय जांच अनिवार्य है। नियमों का पालन किए बिना सेवा से हटाना कानूनन गलत है।

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क्या है पूरा मामला

याचिकाकर्ता शिक्षक ईश्वरी निर्मलकर सहित पांच अन्य की नियुक्ति वर्ष 2007 में जनपद पंचायत मगरलोड में शिक्षाकर्मी वर्ग-3 के पद पर हुई थी। इसके बाद वर्ष 2009 में उन्हें नियमित किया गया। शासन के आदेश के तहत वर्ष 2018 में उनका संविलियन स्कूल शिक्षा विभाग में किया गया। इसके बाद वर्ष 2023 में सभी शिक्षकों को प्राथमिक शाला में प्रधान पाठक के पद पर पदोन्नति भी दी गई। इन शिक्षकों के विरुद्ध छत्तीसगढ़ राज्य लोक आयोग में शिकायत की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया कि उनकी नियुक्ति फर्जी दस्तावेजों के आधार पर हुई है। इस शिकायत के आधार पर वर्ष 2011 में एफआईआर दर्ज कराई गई। वर्ष 2025 में शिक्षकों को आरोपी बनाते हुए न्यायालय में पूरक चालान पेश किया गया, जो फिलहाल ट्रायल कोर्ट में लंबित है।

बिना जांच के बर्खास्तगी आदेश पर सवाल

लोक आयोग के प्रकरण के आधार पर जिला शिक्षा अधिकारी ने शिक्षकों को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए 24 घंटे में जवाब मांगा था। शिक्षकों ने जवाब में आरोपों को निराधार बताया, इसके बावजूद 6 जनवरी को डीईओ द्वारा उन्हें सेवा से बर्खास्त करने का आदेश जारी कर दिया गया। इस आदेश को चुनौती देते हुए शिक्षकों ने अधिवक्ता प्रतीक शर्मा के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका दायर की। याचिका में कहा गया कि बर्खास्तगी आदेश छत्तीसगढ़ सिविल सेवा नियम 1966 के नियम-14 का उल्लंघन है, जिसमें स्पष्ट प्रावधान है कि बिना विभागीय जांच किसी भी शासकीय सेवक को बर्खास्त नहीं किया जा सकता।

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हाई कोर्ट का आदेश

मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने जिला शिक्षा अधिकारी को नोटिस जारी किया है और बर्खास्तगी आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विभागीय जांच के बिना पारित आदेश प्रथम दृष्टया नियमों के विरुद्ध प्रतीत होता है।


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