बिलासपुर। हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि एक ही जमीन की बार-बार और अलग-अलग लोगों के नाम से रजिस्ट्री होती है तो इसमें पहली रजिस्ट्री ही मान्य होगी। डीविजन बेंच ने याचिका को खारी कर दिया है। कोर्ट ने खरीदारों को बिक्री की रकम 6% वार्षिक ब्याज के साथ लौटाने का निर्देश याचिकाकर्ता को दिया है।
हाई कोर्ट ने एक ही जमीन की बार-बार रजिस्ट्री के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। डीविजन बेंच ने कहा कि कि पहली बिक्री को ही वैध माना जाएगा। जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस राधाकिशन अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने यह फैसला संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा-48 के तहत प्राथमिकता के सिद्धांत के आधार पर सुनाया। बेंच ने कहा कि खरीदार राहुल सिन्हा और विकास पांडेय को 16 लाख 26 हजार 724 रुपए सहित ब्याज लौटाने का निर्देश दिया है।
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दुर्ग निवासी राहुल सिन्हा और विकास पांडेय ने 15 जुलाई 2016 को लाल बिहारी मिश्रा से प्लाट खरीदा। इसके लिए उन्होंने बिक्री मूल्य, पंजीयन और अन्य खर्च मिलाकर कुल 16.26 लाख रुपए का भुगतान किया। दो साल बाद उन्हें पुलिस नोटिस मिला, जिससे उन्हें पता चला कि जमीन का असली मालिक सुधाकर राव गायकवाड़ पहले ही 4 जुलाई 2002 को इसे भरत लाल को बेच चुके थे।
सिन्हा और पांडेय ने धोखाधड़ी के खिलाफ सिविल सूट दायर किया। मामले की सुनवाई के बाद दुर्ग जिला कोर्ट ने पहली बिक्री को वैध ठहराया है। कोर्ट ने कहा कि बाद की बिक्री अमान्य मानी जाएगी। कोर्ट ने राहुल सिन्हा और योगेश कुमार पांडेय के पक्ष में डिक्री देते हुए लाल बिहारी मिश्रा को आदेश दिया कि वह खरीदारों को 6% वार्षिक ब्याज सहित 16 लाख 26 हजार 724 रुपए लौटाए।
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जिला कोर्ट के आदेश को चुनोती देते हुए लाल बिहारी मिश्रा ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में बताया कि उन्होंने रजिस्टर्ड विक्रय विलेख के माध्यम से नियमों का पालन करते हुए शुल्क जमाकर जमीन खरीदी है। उनके साथ धोखा हुआ है। हाई कोर्ट ने तथ्यों को सुनने के बाद कहा कि कोई भी व्यक्ति अपने पास मौजूद अधिकार से बेहतर टाइटल नहीं दे सकता। इसलिए पहले खरीदार को ही वास्तविक मालिक माना जाएगा और उसके बाद की सभी बिक्री स्वतः अमान्य होगी। निचली अदालत के आदेश को सही मानते हुए डीविजन बेंच ने याचिकाकर्ता की याचिका को खारिज कर दिया है।
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ऐसे हुई बिक्री
विवादित जमीन मूल रूप से सुधाकर राव गायकवाड़ के नाम थी. गायकवाड़ ने इसे पहली बार 4 जुलाई 2002 को रजिस्टर्ड सेल डीड के माध्यम से भरत लाल को बेचा। भरत लाल ने राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज नहीं कराया, जिससे गायकवाड़ ने जमीन एच. लक्ष्मी को बेच दी। इसके बाद एच. लक्ष्मी ने जमीन लीला बिहारी मिश्रा को बेची, जिन्होंने इसे राहुल सिन्हा और विकास पांडे को बेच दिया।








