Bilaspur High Court: बिलासपुर। छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि बढ़ती महंगाई, जीवन-यापन की बढ़ती लागत और बच्चों की शिक्षा पर होने वाला खर्च गुजारा भत्ता बढ़ाने के लिए पर्याप्त आधार हैं। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की सिंगल बेंच ने फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी और बेटे के लिए भरण-पोषण राशि बढ़ाने के आदेश को बरकरार रखते हुए पति की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।
2016 में हुआ था समझौता, बाद में बढ़े खर्च
मामला जांजगीर-चांपा निवासी संतोष कुमार बरेठ और उनकी पत्नी मालती से जुड़ा है। दोनों के बीच वैवाहिक विवाद के बाद वर्ष 2016 में लोक अदालत में समझौता हुआ था, जिसमें पति ने ₹3,000 प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने पर सहमति जताई थी। समय बीतने के साथ महंगाई बढ़ी और बेटे की पढ़ाई का खर्च भी बढ़ गया, जिसके बाद पत्नी ने भरण-पोषण राशि बढ़ाने की मांग करते हुए परिवार न्यायालय का रुख किया।
फैमिली कोर्ट ने बढ़ाकर किया ₹5,000 प्रतिमाह
सुनवाई के बाद जांजगीर फैमिली कोर्ट ने मार्च 2026 में भरण-पोषण राशि बढ़ाकर ₹5,000 प्रतिमाह कर दी। इसमें ₹2,000 पत्नी और ₹3,000 बेटे के लिए निर्धारित किए गए। कोर्ट ने माना कि बदलती परिस्थितियों और बढ़ते खर्चों को देखते हुए पुरानी राशि पर्याप्त नहीं रह गई थी।
हाई कोर्ट ने पति की दलीलें नहीं मानी
पति की ओर से दलील दी गई कि वह श्रम विभाग में दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी है और उसकी कोई स्थायी आय नहीं है। साथ ही यह भी कहा गया कि पत्नी ने उसकी आय या संपत्ति से संबंधित कोई दस्तावेजी प्रमाण पेश नहीं किया है। हालांकि हाई कोर्ट ने पाया कि पति ने भी अपनी वास्तविक आय और संपत्ति का कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया तथा आवश्यक हलफनामा दाखिल नहीं किया।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
हाई कोर्ट ने कहा कि वर्ष 2016 से 2026 के बीच महंगाई और जीवन-यापन के खर्चों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। साथ ही बच्चे की निजी स्कूल में पढ़ाई के कारण शिक्षा संबंधी खर्च भी बढ़ा है। ऐसे में ₹3,000 प्रतिमाह की राशि पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई ₹5,000 प्रतिमाह की राशि न्यायसंगत और तर्कसंगत है। आदेश में किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि या प्रक्रिया संबंधी खामी नहीं है, इसलिए हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
याचिका खारिज
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की बेंच ने पति संतोष कुमार बरेठ की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।