Bilaspur High Court: दहेज प्रताड़ना के गोलमोल आरोपों पर हाई कोर्ट सख्त, FIR-चार्जशीट और पूरी कार्रवाई रद्द

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Bilaspur High Court: बिलासपुर। छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने दहेज प्रताड़ना के मामलों में पति के पूरे परिवार को एक साथ आरोपी बनाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर कड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि बिना किसी ठोस घटना, तारीख, भूमिका या साक्ष्य के केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर आपराधिक मुकदमा चलाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। हाई कोर्ट ने पति और उसके परिवार के खिलाफ दर्ज एफआईआर, चार्जशीट तथा निचली अदालत में चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया है।

हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि दहेज प्रताड़ना कानून का उद्देश्य पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलाना है, लेकिन इसका उपयोग व्यक्तिगत प्रतिशोध या पूरे परिवार को कानूनी विवाद में घसीटने के लिए नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि किसी भी आरोपी के खिलाफ विशिष्ट आरोप, स्पष्ट भूमिका और ठोस साक्ष्य होना आवश्यक है। केवल रिश्तेदार होने के आधार पर किसी को आरोपी नहीं बनाया जा सकता।

क्या है पूरा मामला?

ओडिशा के नुआपाड़ा जिले के निवासी विवेकानंद भोई का विवाह 25 जून 2023 को छत्तीसगढ़ की गीता साहू के साथ हुआ था। पत्नी ने 20 दिसंबर 2024 को शिकायत दर्ज कराते हुए आरोप लगाया कि शादी के बाद पति, सास-ससुर, ननद और देवर द्वारा दहेज के लिए प्रताड़ित किया जा रहा है। शिकायत में कहा गया कि विवाह के समय मोटरसाइकिल और अन्य घरेलू सामान देने के बावजूद ससुराल पक्ष मुंबई में मकान खरीदने के लिए 40 लाख रुपये नकद और एक कार की मांग कर रहा था। शिकायत के आधार पर पुलिस ने 30 मार्च 2025 को एफआईआर दर्ज की और बाद में चार्जशीट भी पेश कर दी। इसके बाद जेएमएफसी कोर्ट कसडोल ने आरोप तय कर दिए थे।

याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट में क्या कहा?

ससुराल पक्ष की ओर से अधिवक्ता ने हाई कोर्ट में दलील दी कि एफआईआर में किसी भी आरोपी के खिलाफ कोई विशिष्ट घटना, तारीख या अलग-अलग भूमिका का उल्लेख नहीं किया गया है।

याचिका में बताया गया कि—

  • ननद अपने वैवाहिक घर में अलग रहती है।
  • सास-ससुर बुजुर्ग हैं।
  • सभी आरोप सामान्य और सामूहिक रूप से लगाए गए हैं।
  • किसी भी आरोपी की व्यक्तिगत संलिप्तता का उल्लेख नहीं है।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि वैवाहिक विवाद को आपराधिक मुकदमे का रूप देकर पूरे परिवार को परेशान किया जा रहा है।

हाई कोर्ट ने क्या कहा?

डिवीजन बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि हाल के वर्षों में वैवाहिक विवादों में पति के रिश्तेदारों को बिना पर्याप्त आधार के आरोपी बनाने की प्रवृत्ति बढ़ी है।

कोर्ट ने कहा—

केवल सामान्य, अस्पष्ट और गोलमोल आरोपों के आधार पर पूरे परिवार को आपराधिक मुकदमे में घसीटना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए उसकी सक्रिय भूमिका और अपराध में प्रत्यक्ष संलिप्तता का उल्लेख आवश्यक है।

एफआईआर और चार्जशीट दोनों रद्द

मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने—

  • राजादेवरी थाना में दर्ज एफआईआर को निरस्त कर दिया।
  • पुलिस द्वारा पेश चार्जशीट को रद्द कर दिया।
  • जेएमएफसी कोर्ट कसडोल द्वारा संज्ञान लेने और आरोप तय करने के आदेश को भी निरस्त कर दिया।
  • मामले से जुड़ी सभी आनुषंगिक न्यायिक कार्यवाहियों पर रोक लगा दी।

हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी

डिवीजन बेंच ने स्पष्ट कहा कि यदि आरोप केवल सामान्य प्रकृति के हों और किसी आरोपी की विशिष्ट भूमिका सामने न आती हो, तो ऐसे मामलों में आपराधिक मुकदमा जारी रखना कानून और न्यायिक प्रक्रिया दोनों का दुरुपयोग माना जाएगा।कोर्ट ने कहा कि दहेज प्रताड़ना कानून का इस्तेमाल वास्तविक पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए होना चाहिए, न कि पूरे परिवार को बिना पर्याप्त आधार के कानूनी कार्रवाई में फंसाने के लिए।


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