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Bilaspur High Court: बीमा कंपनी को झटका, मृतक के परिजनों को 14.72 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश, कोर्ट बोला- जिम्मेदारी से नहीं बच सकते

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Bilaspur High Court: बिलासपुर। छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने सड़क दुर्घटना में मृत व्यक्ति के परिजनों को बड़ी राहत देते हुए बीमा कंपनी की अपील खारिज कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि केवल आरोप या दावे कर देने मात्र से बीमा कंपनी अपनी कानूनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती। यदि पॉलिसी शर्तों के उल्लंघन का दावा किया जाता है तो उसे ठोस साक्ष्यों से साबित करना होगा। हाई कोर्ट ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण द्वारा निर्धारित मुआवजा राशि में लगभग साढ़े चार लाख रुपये की वृद्धि करते हुए कुल 14 लाख 72 हजार 90 रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया है।

बीमा कंपनी को हाई कोर्ट से झटका

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छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट के जस्टिस संजय के. अग्रवाल की सिंगल बेंच ने ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए पीड़ित परिवार के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि बीमा कंपनी ने अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए पॉलिसी उल्लंघन का तर्क तो दिया, लेकिन उसके समर्थन में कोई विश्वसनीय और ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी। ऐसी स्थिति में कंपनी को मुआवजा भुगतान से मुक्त नहीं किया जा सकता।

क्या है पूरा मामला?

मामला जशपुर जिले के बगीचा थाना क्षेत्र स्थित ग्राम फुलडीह का है। एक सड़क दुर्घटना में देवेंद्र कुमार की मृत्यु हो गई थी। मृतक अपने पीछे पत्नी अनीता, 10 वर्षीय पुत्र प्रेम कुमार और 3 वर्षीय पुत्री मोनिका को छोड़ गया था। मामले की सुनवाई के बाद जशपुर स्थित मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने 17 अक्टूबर 2017 को पीड़ित परिवार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए लगभग 10.50 लाख रुपये का मुआवजा निर्धारित किया था और राशि का भुगतान बीमा कंपनी को करने का निर्देश दिया था।

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बीमा कंपनी ने हाई कोर्ट में दी थी चुनौती

दावा अधिकरण के फैसले को चुनौती देते हुए ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। बीमा कंपनी की ओर से तर्क दिया गया कि दुर्घटना के समय वाहन का उपयोग बीमा पॉलिसी की शर्तों के अनुरूप नहीं किया जा रहा था। कंपनी का कहना था कि मृतक ने वाहन मालिक से वाहन उधार लिया था और पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन हुआ था, इसलिए कंपनी मुआवजा भुगतान के लिए जिम्मेदार नहीं है। वहीं मृतक के परिजनों की ओर से मुआवजा राशि बढ़ाने की मांग की गई।

हाई कोर्ट ने बीमा कंपनी के तर्क को किया खारिज

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पाया कि बीमा कंपनी ने पॉलिसी उल्लंघन का दावा तो किया, लेकिन उसे साबित करने के लिए कोई ठोस दस्तावेजी या मौखिक साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया।

कोर्ट ने कहा—

केवल दावा कर देने से बीमा कंपनी अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती। पॉलिसी उल्लंघन साबित करने के लिए विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक हैं। हाई कोर्ट ने माना कि बीमा कंपनी अपने दायित्व से बचने के लिए पर्याप्त आधार प्रस्तुत करने में विफल रही है।

मुआवजा राशि में साढ़े चार लाख की बढ़ोतरी

मृतक की आय, न्यूनतम मजदूरी दर, भविष्य की आय संभावनाओं और अन्य कानूनी मानकों को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट ने मुआवजे की पुनर्गणना की।कोर्ट ने दावा अधिकरण द्वारा निर्धारित राशि में वृद्धि करते हुए कुल 14 लाख 72 हजार 90 रुपये मुआवजा तय किया। यह राशि पहले निर्धारित मुआवजे से लगभग 4.22 लाख रुपये अधिक है।

7.5 प्रतिशत ब्याज भी देना होगा

हाई कोर्ट ने आदेश दिया है कि बीमा कंपनी निर्धारित मुआवजा राशि पर 7.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित भुगतान करेगी। कोर्ट ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि वह पूरी राशि 45 दिनों के भीतर संबंधित मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (ट्रिब्यूनल) में जमा कराए।

हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी

फैसले में हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—

  • बीमा कंपनी केवल आरोप लगाकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकती।
  • पॉलिसी उल्लंघन साबित करने का दायित्व बीमा कंपनी पर होता है।
  • दुर्घटना पीड़ितों और उनके आश्रितों को न्याय दिलाना मोटर वाहन कानून का प्रमुख उद्देश्य है।
  • तकनीकी आधारों पर वैध दावों को अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

हाई कोर्ट के इस फैसले से सड़क दुर्घटना में मृतक के परिवार को बड़ी राहत मिली है और बीमा दावों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी संदेश भी गया है।


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