Bilaspur High Court: बिलासपुर। चिटफंड कंपनी से जुड़े एक मामले में छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने मध्यप्रदेश के ग्वालियर निवासी 51 वर्षीय सीमा चौधरी की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि जिस व्यक्ति का कथित अपराध से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है, उसे केवल अनुमान के आधार पर आरोपी नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि याचिकाकर्ता वर्ष 2010 में ही कंपनी से अलग हो चुकी थीं, जबकि निवेशकों से रकम जुटाने और कथित धोखाधड़ी की घटनाएं वर्ष 2014 और उसके बाद हुईं। ऐसे में बाद में हुए अपराधों के लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
पढ़िए क्या है मामला?
बालोद निवासी अशोक कुमार साहू ने शिकायत दर्ज कराई थी कि दिव्यानी प्रॉपर्टीज लिमिटेड के निदेशकों और एजेंटों ने निवेशकों को तय अवधि में रकम दोगुनी करने का झांसा देकर करोड़ों रुपये जमा कराए और बाद में रकम वापस नहीं की। शिकायत के आधार पर पुलिस ने आईपीसी की धारा 420, 406, 467, 468, 471, 34, प्राइज चिट्स एक्ट और छत्तीसगढ़ निक्षेपकों के हितों का संरक्षण अधिनियम के तहत अपराध दर्ज किया था।
महिला का नाम FIR में नहीं था
याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि मूल शिकायत और वर्ष 2016 में दर्ज एफआईआर में सीमा चौधरी का कहीं भी नाम नहीं था। पुलिस ने बाद में पूरक चालान में उनका नाम जोड़ दिया। अधिवक्ता ने कहा कि सीमा चौधरी को 22 जनवरी 2010 को उनकी जानकारी के बिना कंपनी का अतिरिक्त निदेशक बनाया गया था। जानकारी मिलते ही उन्होंने अगले ही दिन 23 जनवरी 2010 को इस्तीफा दे दिया था, जिसे कंपनी के बोर्ड ने स्वीकार भी कर लिया था।
सिर्फ एक दिन रहीं डायरेक्टर
कोर्ट को बताया गया कि याचिकाकर्ता तकनीकी रूप से केवल एक दिन कंपनी के बोर्ड में रहीं। इसके बाद उनका कंपनी से कोई संबंध नहीं रहा। वर्ष 2017 में उन्होंने रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज को भी अपने इस्तीफे की जानकारी दे दी थी। अधिवक्ता ने यह भी बताया कि मुख्य आरोपी रमेश चौधरी से उनका वर्ष 2011 से अलगाव हो चुका था और मार्च 2022 में दोनों का कानूनी रूप से तलाक भी हो गया। केवल पूर्व पत्नी होने के कारण उन्हें मामले में घसीटा गया है।
पुलिस के पास नहीं मिला कोई ठोस सबूत
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि जांच के दौरान ऐसा कोई गवाह या दस्तावेज सामने नहीं आया, जिससे यह साबित हो कि उन्होंने निवेशकों को निवेश के लिए प्रेरित किया या कंपनी के संचालन में कोई भूमिका निभाई। उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड भी नहीं है। अधिवक्ता ने तर्क दिया कि बिना किसी प्रत्यक्ष साक्ष्य के उन्हें आरोपी बनाना संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत प्राप्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
हाई कोर्ट ने ट्रायल पर लगाई अंतरिम रोक
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने मामले को गंभीरता से लिया। कोर्ट ने पाया कि कथित अपराध वर्ष 2014 का है, जबकि याचिकाकर्ता वर्ष 2010 में ही कंपनी से अलग हो चुकी थीं। इसी आधार पर कोर्ट ने याचिकाकर्ता सीमा चौधरी के खिलाफ विशेष सत्र न्यायालय में चल रही आपराधिक कार्यवाही पर अगली सुनवाई तक अंतरिम रोक लगा दी है।
राज्य सरकार और शिकायतकर्ता को नोटिस
डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि यह राहत केवल याचिकाकर्ता महिला के लिए है। अन्य आरोपियों के खिलाफ निचली अदालत में ट्रायल पूर्ववत जारी रहेगा। कोर्ट ने शिकायतकर्ता अशोक कुमार साहू और राज्य सरकार को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।