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Bilaspur High Court: कर्मचारियों के लिए खुशखबरी: दशकों की सेवा के बाद नियमितीकरण का हक — हाई कोर्ट

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Bilaspur High Court: बिलासपुर। छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण यानी कैट के उस आदेश को पलट दिया है, जिसके तहत लंबे अरसे से दैनिक वेतनभोगी के रूप में काम कर रहे कर्मचारियों को आउटसोर्सिंग कंपनियों के हाथों सौंप दिया गया था। डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में साफ शब्दों में कहा कि दीर्घकाल से सेवारत ऐसे कर्मचारियों को आउटसोर्सिंग में भेजना न केवल अनुचित है बल्कि गलत भी है। यह मामला आयकर विभाग से जुड़ा हुआ है।

डिवीजन बेंच ने अपने निर्णय में कहा कि याचिकाकर्ताओं की दैनिक वेतनभोगी सेवाएं समाप्त कर उन्हीं से आउटसोर्सिंग एजेंसियों के जरिए वही काम कराना और समान प्रकृति के अन्य कर्मचारियों को नियमित करना पूरी तरह मनमाना और भेदभावपूर्ण रवैया है। ऐसी कार्यवाही भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का खुला उल्लंघन है और कानून की कसौटी पर यह टिक नहीं सकती।

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पढ़िए पूरा मामला

याचिकाकर्ता लतेल प्रसाद यादव, राजबीर दास समेत अन्य ने याचिका में बताया कि आयकर विभाग में अलग-अलग तारीखों पर चतुर्थ श्रेणी के पदों पर उन्हें दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी के रूप में रखा गया था। उन्होंने 10 से 15 वर्षों से अधिक समय तक लगातार विभाग में काम किया और संतोषजनक सेवाएं दीं। याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया कि सेवा के दौरान विभागीय अधिकारियों ने उनके नियमितीकरण के लिए सिफारिश भी की थी।

विभाग ने अचानक बदली अपनी नीति

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याचिकाकर्ताओं ने बताया कि 4 जुलाई 2011 और 25 जुलाई 2011 को आयकर विभाग ने आदेश जारी कर अपनी नीति में बदलाव कर लिया। डाटा एंट्री, टाइपिंग, सफाई और सुरक्षा जैसे कार्यों को दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों की जगह ठेका एजेंसियों के माध्यम से कराने का फैसला किया गया। इसके बाद 14 मार्च 2012 को एक और आदेश जारी कर वर्तमान में कार्यरत दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को भी आउटसोर्सिंग एजेंसियों के जरिए संविदा व्यवस्था में शामिल करने का निर्देश दे दिया गया।

कैट ने ठुकराई याचिका, फिर हाई कोर्ट में दी चुनौती

आयकर विभाग के इस निर्णय को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण की जबलपुर बेंच में याचिका दाखिल की थी। सुनवाई के बाद कैट ने याचिका को खारिज कर दिया। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने कैट के इस फैसले को छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट में चुनौती दी।

नियमितीकरण के दावे को नहीं ठुकराया जा सकता

डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि जो याचिकाकर्ता अभी भी सेवा में हैं, उनके नियमितीकरण के दावे को केवल इस आधार पर नकारा नहीं जा सकता कि उन्होंने 10 अप्रैल 2006 तक 10 वर्ष की सेवा पूरी नहीं की थी। रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने दशकों तक निर्बाध सेवा दी है और वे स्थायी एवं नियमित प्रकृति का काम करते रहे हैं। उनकी नियुक्ति में प्रक्रिया संबंधी खामियां भले हों, लेकिन इसे अवैध नियुक्ति नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का संदर्भ देते हुए कहा कि ऐसे कर्मचारी नियमितीकरण के लाभ पाने के हकदार हैं और उन्हें महज तकनीकी कारणों से इससे वंचित नहीं किया जा सकता।

कैट के फैसले पर हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी

डिवीजन बेंच ने अपने निर्णय में कहा कि केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण की जबलपुर बेंच द्वारा 11 अक्टूबर 2013 को पारित आदेश कानूनी दृष्टि से सही नहीं ठहराया जा सकता। यह आदेश उमा देवी मामले में तय सिद्धांतों के अत्यधिक कठोर और यांत्रिक इस्तेमाल पर टिका था, जबकि बाद के न्यायिक विकास और मामले की वास्तविक परिस्थितियों पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया। कोर्ट ने कहा कि अधिकरण याचिकाकर्ताओं की लंबी, निरंतर और निर्बाध सेवा, उनके द्वारा किए जा रहे स्थायी कार्य, विभाग की नियमितीकरण सिफारिशों और सुप्रीम कोर्ट के बाद के प्रासंगिक निर्णयों पर विचार करने में पूरी तरह विफल रहा।


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