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Bilaspur High Court: ज्यूडिशियल रिमांड पर जेल में बंद आरोपी की रिहाई के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका नहीं लगा सकते, हाई कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

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Bilaspur High Court: बिलासपुर। छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में साफ कहा है कि यदि किसी आरोपी को अदालत के आदेश पर न्यायिक हिरासत में जेल भेजा गया है, तो उसकी रिहाई के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर नहीं की जा सकती। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बीडी गुरु की डिवीजन बेंच ने इस टिप्पणी के साथ रिहाई की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया।

कोर्ट बोला- ज्यूडिशियल कस्टडी अवैध हिरासत नहीं

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हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी सक्षम अदालत के आदेश पर न्यायिक हिरासत में रखा गया व्यक्ति अवैध रूप से निरुद्ध नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल करना न्यायसंगत नहीं है।

पढ़िए क्या है मामला?

जांजगीर-चांपा जिले के बिर्रा थाना क्षेत्र के ग्राम करही निवासी रविशंकर बघेल ने अपने भाई गणपत बघेल की रिहाई के लिए हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। अधिवक्ता प्रशांत साहू के माध्यम से दायर याचिका में कहा गया था कि पुलिस ने उनके भाई को अवैध रूप से हिरासत में रखा है।

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राज्य सरकार ने कोर्ट में रखे दस्तावेज

राज्य शासन की ओर से पेश विधि अधिकारी ने कोर्ट को बताया कि गणपत बघेल के खिलाफ बिर्रा थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 103(1), 331(8), 109(1), 61(2), 238 तथा आर्म्स एक्ट की धारा 25 और 27 के तहत गंभीर अपराध दर्ज हैं। सरकार की ओर से बताया गया कि आरोपी को 27 मई 2026 को चांपा के JMFC कोर्ट में पेश किया गया था, जहां से न्यायालय ने उसे ज्यूडिशियल रिमांड पर जेल भेज दिया।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला

मामले की सुनवाई के दौरान डिवीजन बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका केवल उन्हीं मामलों में विचारणीय होती है, जहां किसी व्यक्ति को पूरी तरह गैरकानूनी या अवैध तरीके से हिरासत में रखा गया हो।

हाई कोर्ट ने याचिका की खारिज

डिवीजन बेंच ने कहा कि चूंकि आरोपी न्यायालय के आदेश पर जेल में बंद है, इसलिए इसे अवैध निरुद्धता नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को खारिज कर दिया।


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