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Supreme Court News: 13 साल पुराने कोरबा अपहरण और हत्या केस में सुप्रीम कोर्ट की एंट्री, हाई कोर्ट से आरोपी के बरी होने के खिलाफ SLP पर नोटिस जारी

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Supreme Court News: बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के बहुचर्चित अपहरण और हत्या मामले में अब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हो गई है। पीड़ित पक्ष ने विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर कर छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को सुनवाई योग्य मानते हुए छत्तीसगढ़ सरकार और अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

सुप्रीम कोर्ट ने चार सप्ताह में मांगा जवाब

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मामले की सुनवाई जस्टिस संजय करोल और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की डिवीजन बेंच में हुई। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को शपथ पत्र के साथ जवाब पेश करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री को निर्देश दिया है कि याचिका की प्रति एक सप्ताह के भीतर राज्य सरकार के अधिवक्ता को उपलब्ध कराई जाए। याचिकाकर्ता मुकेश कुमार बैरागी ने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए एसएलपी दायर की है। याचिका विलंब से दाखिल होने पर सुप्रीम कोर्ट से माफी भी मांगी गई थी। शीर्ष अदालत ने मानवीय आधार पर देरी को माफ करते हुए एसएलपी स्वीकार कर ली।

छह साल के मासूम का हुआ था अपहरण

मामला वर्ष 2013 का है। 16 मई 2013 को कोरबा जिले के उरगा थाना क्षेत्र से छह वर्षीय भूपेश उर्फ अप्पू के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। अगले दिन बच्चे के दादा को फोन कर 10 लाख रुपये की फिरौती मांगी गई। जांच के दौरान पुलिस ने कॉल डिटेल और मोबाइल सिम के आधार पर आरोपी अरुण कुमार वैष्णव को गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार आरोपी ने आर्थिक तंगी और परिवार को अपमानित करने की नीयत से बच्चे का अपहरण किया था। पूछताछ में आरोपी ने बच्चे की हत्या कर शव स्टोर रूम में छिपाने की बात स्वीकार की थी। इसके बाद पुलिस ने शव बरामद किया था।

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ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी आजीवन कारावास

मामले की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को आईपीसी की धारा 363, 364A, 302 और 201 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास सहित विभिन्न सजाएं सुनाई थीं।

हाई कोर्ट ने आरोपी को किया था बरी

आरोपी ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस एके प्रसाद की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के बाद आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि जांच प्रक्रिया में गंभीर खामियां थीं। शव बरामदगी की प्रक्रिया, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य आरोपी को अपराध से जोड़ने के लिए पर्याप्त नहीं थे। कोर्ट ने माना था कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला पूरी नहीं हो पाई और अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में विफल रहा।

पीड़ित पक्ष पहुंचा सुप्रीम कोर्ट

अब पीड़ित पक्ष ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद मामले में एक बार फिर कानूनी बहस तेज हो गई है। अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होने की संभावना है।


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